हैदराबाद मनपा चुनाव की देशव्यापी गूंज

भाजपा की जैसी आंधी राष्ट्रीय राजनीति में 2014 यानी मोदी युग की शुरुआत से चल रही है, भले ही उसके पहले ऐसी हालत नहीं थी लेकिन उत्तर भारत और पश्चिम भारत और मध्य भारत में उसका व्यापक जनाधार था। लम्बे समय से वह प्रभावी दल थी. सत्ता में आती जाती रहती थी. उसके लिए दक्षिण भारत बंगाल और पूर्वोत्तर के अन्य राज्य चुनौती बने हुए थे. कालांतर में उसने मोदी युग के पहले कर्नाटक में अपनी स्थिति काफी मजबूत की और मोदी युग में इस पर स्वर्ण कलश चढ़ाने का काम हुआ. आज पूरे देश सहित पूर्वोत्तर में भाजपा का डंका बज रहा है. पूर्वोत्तर के राज्य तो मोदी के पिछले ही कार्यकाल में भाजपा के एजेंडे में थे और उसका परिणाम भी शानदार हुआ. आज वहां लगभग हर राज्य में भाजपा की सरकारें है .बंगाल में भी पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया है और जिस तरह आज पार्टी जीजान से वहां काम में लगी है, जनाधार बढ़ाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है, साथ ही जिस तरह टीएमसी के अन्दर हर तरह का असंतोष सामने आ रहा है उसके बड़े बड़े नेता और विधायक पार्टी को टाटा कह रहे है उससे तो आज यही लगता है की इस बार सत्ता में वापसी के लिए ममता बनर्जी को लोहे के चने चबाना होगा. उनकी सत्ता में वापसी यदि असंभव नहीं तो काफी मुश्किल जरूर नजर आ रही है. बंगाल में दूसरे विरोधी कांग्रेस और वामदल जिनके आपस में चुनावी तालमेल करने की चर्चा आज कल हो रही है अभी कुछ ज्यादा कर पाने की हालत में है ऐसा नहीं लगता. लगभग चार दशक से कांग्रेस वहां सत्ता से दूर है उसके इर्द गिर्द भी नहीं फटक पायी है जबकि वामदल जबसे ममता द्वारा सत्ता से उखाड़ फेंके गए कुछ करते नहीं प्रतीत हो रहे है, उनकी हालत देश और उक्त राज्य हर जगह दयनीय है. तो सीधा मुकाबला भाजपा और टीएमसी में होगा. उसमे हैदराबाद का चमत्कार काफी निर्णायक भूमिका अदा करेगा इसमें कोई संदेह नहीं है, हैदराबाद दक्षिण की राजनीति का एक केंद्र है और जिस तरह भाजपा ने वहां दो से सीधे 48 की छलांग लगाई है उससे निसंदेह दक्षिण के राज्यों में एक बड़ा सन्देश जाएगा और पूरे देश में भाजपा कार्यकर्ताओं के मनोबल में वृद्धि करेगा. संकेत साफ़ है की भाजपा का राष्ट्रवाद, हिन्दुवाद और सबका साथ सबका विकास का नारा अब दक्षिण के उन राज्यों को भी भा रहा है जहाँ उसकी दाल अब तक नहीं गली थी परिणाम अब भाजपा आसन्न तमिलनाडू चुनाव और उसके बाद होने वाले बंगाल और केरला के चुनाव में और जोश और ताकत से मैदान में उतरेगी.

इस का सीधा सादा परिणाम है कि अब देश का हर कोना भाजपा के एजेंडे का अनुमोदन का कर रहा है. हैदराबाद एक तरह से प्रमाण पत्र है कि जिस रीति नीयत से भाजपा नीत सरकारें अपना काम कर रही है, वह जन अपेक्षाओं के अनुरूप है. इसका मतलब साफ़ है कि भाजपा अपने इस एजेंडे पर आगे और तेजी सी काम करने वाली है. हां, इस लड़ाई में या इसके पूर्व की बिहार की लड़ाई में जिस तरह ओवैसी अपनी पकड बचाने और बढ़ाने में कामयाब हुए और जिस तरह से वह समाज में अलगाववादी और अल्पसंख्यक परस्त, लोगों को बांटने वाला एजेंडा चला रहे है यह जरूरी देश के लिए चिंता की बात है क्षेत्रवादी ताकतें कम जोर हो रही है उन्हें कहीं भाजपा का कहीं कांग्रेस का दामन पकड़ना पड़ रहा है लेकिन जाति और धर्मवादी ताकतों का क्षरण ना होना देश के लिए चिंता की बात है अब भाजपा और अन्य जिम्मेदार दलों को इन नकारात्मक शक्तियो को भी कमजोर करने और धीरे धीरे नेस्तनाबूद करने के लिए अपनाने जाने वाली रणनीति पर विचार करना होगा. कारण अब ओवैसी जैसे नेता अपने पंख को तमिलनाडु और बंगाल तक पहुँचने में लग गए है, रही बात भाजपा की तो उसकी हैदराबाद में सफलता दक्षिण में तो उसका डंका बजा ही रही है, उसकी गूँज देश के कोने कोने तक हो रही है और आने वाले कई राज्यों के चुनाव में उसकी मदद करेगी.


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