चुनाव के पैमाने बदल रहे है

अब देश का कोई भी चुनाव शायद दलगत राजनीति से अलग नहीं रह गया है। पहले लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों से राजनीतिक दलों का जनाधार नापा जाता था, मगर अब तो विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, नगर निकायों और ग्राम पंचायतों तक के चुनाव इसका पैमाना बनते गए हैं। इसी महीने हुए दो चुनाव इसके ताजा उदाहरण हैं। हैदराबाद नगर निकाय के चुनाव और राजस्थान में पंचायत चुनाव। इनमें राजनीतिक दलों की केंद्रीय कमान को भी खूब सक्रिय देखा गया। फिर नतीजों के बाद राजनीतिक दलों के जनाधार नापने के प्रयास किए गए। राजस्थान पंचायत चुनावों में मिली कामयाबी को भाजपा नेताओं ने न सिर्फ कांग्रेस की घटती लोकप्रियता, बल्कि कृषि कानूनों को लेकर वहां के लोगों की राय के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है। यही हाल विश्वविद्यालयों के चुनावों को लेकर भी देखा जाता है। यों राजनीतिक दलों ने युवाओं में अपनी पकड़ मजबूत बनाने के मकसद से बहुत पहले विश्वविद्यालय स्तर पर भी छात्र इकाइयां स्थापित करनी शुरू कर दी थीं, पर परिसरों में इतनी राजनीतिक जकड़बंदी नहीं हुआ करती थी। छात्र नेता मुद्दों और अपने निजी संपर्कों के आधार पर ही चुनाव जीता करते थे। पर धीरे-धीरे वहां भी दलगत पहचान ही प्रमुख होती गई है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव चाहे छोटे स्तर के हों या बड़े, उनमें मिली कामयाबी से राजनीतिक दलों के कार्यकतार्ओं का मनोबल बढ़ता ही है। फिर राजनीतिक दलों की पहचान के साथ जो भी चुनाव लड़े जा रहे हों, उनमें बड़े नेताओं का प्रत्यक्ष समर्थन मिलने से छोटे नेताओं को बल मिलता है। इसलिए अगर राजनीतिक दल छोटे चुनावों में भी अपनी ताकत झोंकते देखे जा रहे हैं, तो एक लिहाज से बुरा नहीं कहा जा सकता। सच्चाई यह भी है कि जिस राजनीतिक दल का जनाधार सबसे निचले स्तर पर जितना मजबूत होता है, ऊपर के पायदान पर उसकी कामयाबी की संभावनाएं भी उतनी ही बढ़ जाती हैं। मगर इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि हर चुनाव का जनाधार एक जैसा नहीं होता। लोकसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव का दायरा काफी बड़ा होता है। उसमें प्रत्याशी के लिए हर मतदाता से रूबरू मिल पाना संभव नहीं होता। विधानसभा चुनाव में यह दायरा छोटा हो जाता है। प्रत्याशी के लिए ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं से मिलना संभव होता है। फिर भी उसका क्षेत्र इतना छोटा नहीं होता कि हर मतदाता से मिला जा सके। ऐसे में राजनीतिक दलों की विचारधारा और उनके कामकाज के तरीके, उपलब्धियों आदि का मतदाता पर प्रभाव अधिक पड़ता है। पंचायत और नगर निगम चुनावों, यहां तक कि छात्र संघ चुनाव, का दायरा सबसे छोटा होता है। उसमें हर प्रत्याशी को मतदाता बहुत नजदीक से जानते-पहचानते और उसके व्यक्तित्व से परिचित होते हैं। उनमें मतदान करते समय उन पर प्रत्याशी के व्यक्तित्व का प्रभाव अधिक होता है, राजनीतिक दलों का प्रभाव बहुत असरकारी साबित नहीं होता। गांवों में लोग पहले अक्सर सर्वसम्मति से मुखिया चुन लिया करते थे। अब भी बहुत सारी जगहों पर यही होता है कि गांवों के बहुसंख्यक लोग जिस प्रत्याशी के पक्ष में मन बना लेते हैं, वही मुखिया होता है। ऐसे में उन नतीजों को केंद्र की नीतियों या सत्तारूढ़ पार्टी की उपलब्धियों से जोड़ कर देखना भ्रामक साबित हो सकता है। फिर इस तरह पंचायत स्तर पर राजनीतिक दलों की सक्रियता से पंचायती राज व्यवस्था के मकसदों में भी बाधा पहुंचती है। ग्राम पंचायतों को इसीलिए स्वायत्तता दी गई थी कि वे प्राय: राजनीतिक और सरकारी प्रभावों से मुक्त मानी जाती हैं।

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