नए साल में स्वदेशी उत्पादों के इस्तेमाल का संकल्प लेंः मोदी

Modi

नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को रेडियो कार्यक्रम मन की बात के जरिए देशवासियों को संबोधित किया। यह इस कार्यक्रम का 72वां और 2020 का आखिरी संस्करण था। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि चार दिन बाद नया साल शुरू होने वाला है। अब अगले साल अगली मन की बात होगी। उन्होंने कहा कि देश में नया सामर्थ्य पैदा हुआ है, जिसका नाम आत्मनिर्भरता है। 

प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के सम्मान में सामान्य मानवी ने बदलाव को महसूस किया है। मैंने देश में आशा का एक अद्भुत प्रवाह भी देखा है। चुनौतियां खूब आई, संकट भी अनेक आए लेकिन हमने हर संकट से नए सबक लिए। उन्होंने कहा कि हमें वोकल फॉर लोकल की भावना को बनाए रखना है। प्रधानमंत्री ने इस साल का रिजॉल्यूशन देश के लिए लेने को कहा। इसके अलावा उन्होंने सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल न करने की अपील की। 

चार दिन बाद नए साल की शुरुआत होने जा रही है। अगली मन की बात 2021 में होगी। मेरे सामने आपकी लिखी ढेर सारी चिट्‌ठियां हैं। आप जो सुझाव भेजते हैं, वह भी हैं। कई लोगों ने फोन पर अपनी बात बताई। ज्यादातर बातों में बीते वर्षों के अनुभव और नए साल के संकल्प हैं। अंजली जी ने लिखा है कि इस बार हम ये नया काम करें कि देश को बधाई दें, शुभकामनाएं दें।

 जानवरों के लिए भी संवेदनशीलता दिखाएं

मैंने तमिलनाडु में एक हृदयस्पर्शी प्रयास के बारे में पढ़ा। हम सबने इंसानों के लिए व्हीलचेयर देखी है, लेकिन कोयंबटूर की बेटी गायत्री ने अपने पिताजी के साथ एक पीड़ित डॉग के लिए व्हीलचेयर बना दी। ये तभी हो सकता है, जब व्यक्ति हर जीव के प्रति, दया और करुणा से भरा हुआ हो। उत्तर प्रदेश के कौशांबी की जेल में गायों को ठंड से बचाने के लिए पुराने और फटे कम्बलों से कवर बनाए जा रहे हैं।

 मंदिरों के जीर्णोद्धार में जुटे युवा

एक युवा ब्रिगेड ने कर्नाटक में स्थित श्रीरंगपट्टनम के पास वीरभद्र स्वामी के एक प्राचीन शिव मंदिर का कायाकल्प कर दिया। यहां हर तरफ घास-फूस और झाड़ियां थीं कि लोगों को मंदिर दिखता तक नहीं था। युवाओं की लगन देखकर स्थानीय भी मदद के लिए आगे आए।

शहादत न भूलें

देश की हजारों साल पुरानी संस्कृति, सभ्यता, हमारे रीति-रिवाजों को बचाने के लिए कई बलिदान दिए गए। 27 दिसंबर को गुरु गोविंद सिंह जी के बेटों जोरावर सिंह और फतेह सिंह को दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया था। अत्याचारी चाहते थे कि साहिबजादे महान परंपरा की सीख छोड़ दें, लेकिन उन्होंने गजब का साहस दिखाया। दोनों बेटों के सामने मौत मंडरा रही थी, फिर भी वे सिद्धांतों से टस-से-मस नहीं हुए।


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