कांग्रेस की सियासत के बरगद के पेड़

कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है. उसका देश में लगभग पांच दशक से ज्या दा समय तक एक छत्र राज रहा है. स्वा भावि क है उसके चलते राजनीति क घरानावाद पनपा और गहरी जड़ जमाने में कामयाब हुआ. देश के स्व तंत्र ता की उषा काल की राजनीति में ऐसे लोगों की तादाद ज्या दा थी, जिनके लि ए राजनीति स्व और स्व परिवार की सेवा से ज्या दा जन सेवा थी. उनमे देश व समाज को लेकर उसके उत्था न का एक स्व प्न था. उन्होंने उसी तरह काम कि या और लोगों का उन्हें वैसा ही मान सम्मा न भी मि ला, साथ ही उसी आस से वे उनकी भावी पीढ़ी को भी देखने लगे और उनके बाद उनकी भी वैसी ही अवस्था बनती गयी. आला कमान ने भी इसी प्रवृति को बढ़ावा दि या और काबिलि यत से कहीं ज्या दा कांग्रेस में पार्टी और आला कमान की निष्ठा को तरजीह दी जाती रही. आज यही कांग्रेस का सबसे बड़ा रोग बन गया है, कारण देश के हर राज्य जि ले में फैले ऐसे खानदान और उनको मि लने वाली वरीयता कांग्रेस की सबसे बड़ी कमी है. कारण ये घराने लम्बे्बे समय से सत्ता या सत्ता के इर्द -गिर्द रहने के नाते इतने सशक्त हैं कि बि ना इनके आशीर्वा द या सहयोग के कोई नया नेतृत्व पनप ही नहीं सकता और यही कांग्रेस की सबसे बड़ी बाधा है. जीवन भर पंचसितारा महौल के आदी यह नेता खुद तो मैदानी जंग नहीं कर सकते. पार्टी की पुरानी रीति -नीति परंपरा और तौर-तरीके को ध्व ज वाहक ये 2014 से देश की राजनीति और सरकार संचालन के तौर -तरीकों में हुए बदलाव को समझ ही नहीं पा रहे है. जो नए लोग इसे समझ रहे है उन्हें आगे नहीं आने देते, यह समस्या पार्टी में ऊपर से नीचे तक है और इसमें बदलाव कांग्रेस आला कामन स्त र से ही शुरू करना होगा. पार्टी के लि ए जि तनी निष्ठा जरूरी है उतनी ही काबिलि यत भी. एक की कीमत पर दूसरे को कुर्बा न नहीं कि या जा सकता. जो यह तीनों काबिलि यत रखते हैं, लेकि न पुराने कांग्रेसी जो अब भी अपने-अपने इलाके में अपना-अपना रसूख रखते हैं, धनबल और बाहुबल से भी सज्ज है परन्तु् तु कालवाह्य हो चुके है और उम्र के उस पड़ाव पर हैं कि नए बदलाव को आत्मसात नहीं कर सकते उन्हें आगे बढ़ने नहीं दे रहे है. परिणाम स्व रूप या तो वे निष्क् रिय हैं या हताशा में अपनी पार्टी छोड़ कर कोई नयी पार्टी का दामन पकड़ रहे है. यह अनायास ही नहीं कि यदि भाजपा, शि वसेना और वामदलों को छोड़ दें, तो अधिकांश छोटे दल कांग्रेस की इसी अवस्था की उपज है, जहां बड़े-बड़े घरानों ने उन्हें पनपने नहीं दि या और उसका दामन छोड़ कर या नयी पार्टी बनाकर वे अपने राज्य का ही नहीं, देश के भी नामचीन नेता बन गये. यह साबि त करता है कि इस तरह की रीति -नीति ने कांग्रेस को घरानों से तो कनेक्ट रखा, और जब तक घराने जनता अभि मुखी थे तब तक ठीक थे, लेकि न जैसे-जैसे उनका धनबल और बाहुबल बढ़ा उससे सत्ता का मद भी बढ़ा तो उनका जनता से जुड़ाव कम हो गया और कांग्रेस का भी जन कनेक्श न टूट गया. आज कांग्रेस उसी दौर से गुजर रही है, उसके पास बड़े-बड़े नेता हैं, लेकिन जनाधार हर चुनाव में खिस क रहा है. भजपा ने अनायास ही नहीं 75 वर्ष में रिटायर करना अनि वार्य कि या, उनमें कई आज भी राज्य पाल के रूप में, संगठन में अपनी-अपनी सेवाएं दे रहे हैं. कांग्रेस को निष्ठा और योग्य ता के साथ-साथ नए लोग कैसे आयें इस पर सोचना होगा. यह तब होगा जब पार्टी कोई ऐसा मैकेनि ज्म विकसित करेगी जब घरानों की दृष्टि से इतर उन इलाकों के ऐसे लोगों को आगे लायेगी जो पार्टी और नेतृत्व के प्रति एक निष्ठ रहते हुए, पार्टी की गाड़ी को नए युग की आवश्य कताओं के अनुसार आगे बढ़ा सकेंगे व राजनीति कर सकेंगे. कमल नाथ ने आराम करने का संकेत देकर अच्छी शुरुवात की हैं ऐसे कदम अन्य राज्यों में ऐसे नेताओं को भी उठाना चाहिए. जो बरगद बन गए है और उनकी छांव में नए पौधे नहीं उग पा रहे हैं

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