अभ्यंग से दृढ़ होता है मानव शरीर


सस्कृत में अंग धातु गति अर्थ में लगाया जाता है। उसमें 'अभि' उपसर्ग से अभ्यंग शब्द बना है। तेल, वसा आदि को शरीर पर हाथ से रगड़ कर जो मालिश की जाती है, इसे ही आयुर्वेद में अभ्यंग कहा गया है।

आयुर्वेद में पंचकर्म विज्ञान के अंतर्गत 'बाह्य स्नेहन' में अभ्यंग का चिकित्सा की दृष्टि से भी काफी महत्त्व है। आचार्यों ने स्वस्थ लोगों में स्वास्थ्य की रक्षा के लिए अभ्यंग को 'अभ्यंग माचरेनित्य' अर्थात, प्रतिदिन आवश्यक कहा है।

आचार्य अरूण दत्त ने इस विषय पर कहा है कि यदि प्रतिदिन अभ्यंग करना सम्भव न हो तो दो या तीन दिन छोड़ कर अभ्यंग करने से भी लाभ होता है। आचार्य हेमाद्रि कहते हैं कि अभ्यंग हमेशा भूखे पेट ही लाभकारी है क्योंकि उस समय शरीर शुद्ध रहने से रोमकूपों के द्वारा स्नेह का प्रभाव सारे शरीर में फैल जाता है। आचार्य अरूण दत्त ने विसर्ग काल में प्रात: अभ्यंग का महत्त्व बताया है।

आचार्य वाग्भट्ट ने ऋतु के अनुकूल वातहन और सुगंधित तेलों को नित्य अभ्यंग के लिए कहा है। आचार्य सुश्रुत ने तेल, घी, या किसी भी स्नेह से देश, ऋतु, प्रकृति, साम्य दोष तथा रोग का विचार करते हुए अभ्यंग करने के लिए कहा है। अभ्यंग के द्वारा त्वचा के छिद्रों में तेल बना रहने से शरीर में जीवाणुओं का प्रवेश नहीं हो पाता अर्थात त्वचा की रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ जाती है

अभ्यंग विधि

अभ्यंग सिर, पांव और कनपटी (कर्णपूरन) पर अवश्य करना चाहिए। अभ्यंग में देश काल के अनुकूल तेल लेकर सुख पूर्वक धीरे-धीरे अनुलोम गति से मलना चाहिए। सिर में अभ्यंग शीतल घी, तेल से करना चाहिए क्योंकि सिर प्रधान मर्म है, अत: इसे गर्मी से बचाना चाहिए। हाथ, पांव इत्यादि में उष्ण घी, तेल से अभ्यंग किया जा सकता है। शीत ऋतु में उष्ण तेलों यथा तिल आदि से तथा उष्ण ऋतुओं में शीत तेलों यथा आंवला, ब्राह्मी आदि तेलों से अभ्यंग लाभकारी है। अभ्यंग द्वारा भीतर के अवयवों की नलियों में उत्तेजना होती है।

अभ्यंग किसको नहीं करना चाहिए

कफ प्रधान रोगों में, वमन, विरेचन,  अजीर्ण रोगी, ज्वर से पीडि़त, रोगियों को अभ्यंग नहीं करना चाहिए।

अभ्यंग काल

15 मिनट से 35 मिनट तक अभ्यंग करने से आयुर्वेदिक मतानुसार तेल त्वचा के रोमों से लेकर रक्त, मांस, मेज, मज्जा, अस्थि तक पहुंच जाता है। अभ्यंग के बाद 15 मिनट तक विश्राम करना आवश्यक है। 


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