अति सर्वत्र वर्जयेत‍्

यह पुरानी कहावत है कि अति किसी चीज की ठीक नहीं होती. किसान नेताओं ने अति कर दी है. इन्होंने रद्द करने की तोतारटंत इतने लम्बे समय तक जारी रखी उसे इतना ताना कि वह देश के आम जन मानस की संवेदना और सहानुभूति खोता जा रहा था और जिस तरह कि अराजकता ट्रैक्टर रैली के दौरान नजर आई उसने रही सही कसर पूरी कर दी. जिस तरह वहां राष्ट्रीयध्वज का ध्वज का अपमान हुआ, पुलिस बल पर हमला हुआ और पूरे शहर को हथियार बंद आराजक तत्वों ने बन्धक बनने का प्रयास किया उसका प्रतिफल अब मिलना शुरू हो गया है. अब सब पर देशद्रोह के मामले दर्ज हो चुके हैं. पुलिस की नोटिस जा रही है, अब इन्हें पता चलेगा की किसी बात को तर्क और चर्चा से परे ले जाने का क्या परिणाम होता है. इन्हो ने अपने ही हठधर्मिता से आन्दोलन को दिशाहीन कर दिया और अब उसमे टूट शुरू हो गयी है. तंबू उखड़ने लगे हैं, अब इस पर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने का खेल खेल कर रहे राजनीतिक दल फिर से सक्रिय हो रहे हैं और इसे साजिश करार देने से लेकर राष्ट्रपति का अभिभाषण का बहिष्कार करने की घोषणा कर रहे हैं. कांग्रेस, रांकपा सहित लगभग डेढ़ दर्जन राजनीतिक दलों का यह प्रयास निहित स्वार्थ की पराकाष्ठा है. यह भाजपा नीत केंद्र सरकार का विचाधारात्मक रूप से मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं और उसका राजनीतिक उठाव भी नहीं देख पा रहे हैं तो किसान कानून को बिना मुद्दे का मुद्दा बना कर किसान नेताओं के सुर में सुर मिला रहे, लेकिन यह सुर मिलाना कितना खतरनांक है, यह देश और दुनिया ने गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली में देखा. जिस कानून को लेकर देश के 90 प्रतिशत किसान कुछ नहीं बोल रहे हैं और जिन्हें इस पर आपत्ति है, उनकी आपत्ति दूर करने के लिए सरकार हर तरह से तैयार है. उसके बात भी सिर्फ रद्द करने पर अड़े रहने की प्रवृत्ति का सच देश का जन मानस जान चुका है. यही कारण है कि अब स्थानीय लोग भी धरना स्थल पर जाकर मांग कर रहे हैं कि आन्दोलनकारी जो महीनों से डेरा जामये बैठे हैं उनके इलाके से चले जाएं.

आन्दोलन का हक किसी को भी है, लेकिन उसकी पहली शर्त है कि वह शांति पूर्ण हो. किसी की परेशानी का कारण ना बने और उनकी मांग पर जब सुनवाई हो रही है तो उस पर अड़ियलपन का प्रदर्शन ना हो. यहां किसान कम किसान नेता ज्यादा दिख रहे हैं और दिख रहे हैं ऐसे लोग जिनका किसी ना किसी मुद्दे को लेकर आंदोलनरत रहना काम बन गया है मेधापाटकर, योगेन्द्र यादव और ऐसे तमाम लोग किसी ना किसी तरह से आन्दोलन करते रहने और अपने सत्ता विरोधी तेवर के लिए जाने जाते हैं कभी अन्ना के साथ खड़े मिलते हैं तो कभी किसी और के साथ और आज किसानों के सबसे बड़े रहनुमा हैं, ये किसान की हालत को उसे ज्यादा जानते हैं, जबकि यथार्थ यह है की अधिकांश किसान ही नहीं जानते की उनके लिए क्यों अन्दोलन हो रहा है. 

सारांश यह है की जिस तरह आन्दोलन का संचालन हो रहां है और जिस तरह रद्द-रद्द की तोतारटंत जारी है उसे साफ़ है कि इनकी मनसा मामले के समाधान में नहीं है, इनका एजेंडा ओछी राजनीति की मध्यम से मामले को लंबा खींच कर केंद्र सरकार को परेशान करना है और राजनीतिक फायदा प्राप्त करना है. इसकी जो परिणित मंगलवार को दिल्ली में हुई यह इसी घटिया नीति का परिणाम है और अब वही हो रहा है जो अड़ियलऔर अतिवाद का होता है. इसने देश की सहानुभूति खो दी है, लोगों को लग रहा है कि किसान के लिबास में असामाजिक तत्व सक्रिय हो गए हैं.तो इसमें टूट का श्री गणेश हो चुका है. अति से कभी भी किसी का भला नहीं हुआ है और इनका भी नहीं होगा. अब इन्हें अपने दुराग्रह से हट कर बातचीत से मार्ग निकालना चाहिए. नहीं तो अब तंबू उखाड़ने लगे हैं अब वे वहां ज्यादा दिन रहेंगे ऐसा नहीं लगता.इस पूरे आन्दोलन का बंटाधार पेशेवर आन्दोलन करी और उनके शैली कर चुकी है.

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