झंझावातो में ममता की राजनीति की नाव

पश्चिम बंगाल के चुनाव का समय जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है. वैसे वैसे सर्वभारतीय तृणमूल कांग्रेस पार्टी में भगदड़ भी तेज होती जा रही है. शायद ही कोई दिन ऐसा गुजर रहा है, जब कोई ना कोई नेता बगावत का स्वर न बुलंद करता हो. इससे निस्संदेह मुख्यमंत्री पद की दूसरी पारी खेल रही ममता बनर्जी की परेशानी बढ़ती जा रही है, भले ही वह अभी भी मैदान में डटी अपनी विजय का दावा कर रही हैं, लेकिन जिस तरह उन्होंने पिछले दिनों वाम पक्ष और कांग्रेस से मिलकर भाजपा का मुकाबला करने का आवाहन किया, उससे यह साफ़ संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा के बंगाल विजय करने के अाक्रामक अभियान और उनकी पार्टी से हो रहे पलायन ने उन्हें विचलित करना शुरू कर दिया है. थोड़ा बहुत आयाराम - गयाराम चुनाव की बेला पर हर पार्टी में होता है लेकिन जिस तरह की भगदड़ टीएमसी में मची है, उससे साफ़ जाहिर है कि ममता जी की कार्यशैली को लेकर उनकी पार्टी में व्यापक आक्रोश है और उनके द्वारा अपने भतीजे को आगे करने की नीति ने उनके पार्टी के उनके बाद के सभी नेताओं को सशंकित कर दिया है. कारण उसके चलते उनके आगे बढ़ने की एक सीमा रेखा निर्धारित हो गयी, अब सबके सामने भाजपा के रूप में एक सशक्त विकल्प दिख रहा है और उसमे परिवारवाद को वह तरजीह नहीं मिल रही है जो अन्य दलों में नियम सा बन गया है तो वे किनारा करने में देरी नहीं कर रहे हैं. ममता को अपनी पार्टी के अन्दर घुमड़ रहे असंतोष के ज्वालामुखी का आभास ही नहीं हुआ और अब जब आभास हो रहा है तो उसका मुकाबला करने की शक्ति या समय उनके पास है ऐसा नहीं लगता. कारण एक तो उनकी हालत दिनोंदिन पतली होती जा रही है और दूसरे उनका जो मत बैंक है, वही मत बैंक को अपना मानने वाले कई दावेदार मैदान में हैं जबकि भाजपा का अपना मत बैंक है, जो लगातार बढ़ रहा है. जिस अल्पसंख्यक और धर्म निरपेक्ष मत के बदौलत वे 10 साल से सत्ता में हैं, उनमे सेंध लगाने के लिए कांग्रेस और वाम दल पहले से ही वहां मैदान में मौजूद हैं. अब इस बार जदयू और एमआईएम भी राज्य में एड़ी-चोटी का जोर लगाने वाली है. इसके पहले के चुनावों में भाजपा वहां इतनी बड़ी शक्ति नहीं थी. मोदी युग में जिस तरह बंगाल में ध्यान दिया गया, उसका प्रतिफल उसने गत लोकसभा चुनाव में उल्लेखनीय सफलता के रूप में भी देखा और आज उसका हौंसला और उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल बुलंद है, तो इसका मुकाबला टीएमसी प्रमुख कैसे करेंगी, यह समझ से परे होता जा रहा है. ममता आक्रामक नेतृत्व के लिए जानी जाती रही हैं, लेकिन विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों की आक्रामकता में काफी फर्क होता है. सत्ता और सतत विजय के मद में वे अपनी पार्टी को एकजुट रखने में उसे भाई-भतीजावाद से दूर रखने में चूक गयी. साथ ही सत्ता प्रमुख के रूप में बंगाल में सबका विकास और सबका साथ वाला पारदर्शी शासन भी नहीं दे पायी और आज उनके पार्टी कार्यकर्ताओं पर हिंसा में शामिल होने का आरोप लग रहे हैं जिसके लिए वाम दल अपने सरकार के कार्यकाल में कुख्यात हो गए थे. परिणामत: ममता सुरक्षात्मक रुख या अपनाने को मजबूर होती जा रही है. ऐसे परिद्रश्य में ममता के लिए अपना किला बचाना काफी चुनौती पूर्णा होगा. आज देश की राजनी​ित का एजेंडा, तौर तरीका बदला चुका है, विकास का लाभ सीधे लक्षित वर्ग तक पहुंच रहा है. सेक्युलर फ्रंट द्वारा अब तक अपनाई गयी, रीति-नीति मोदी युग की राजनी​ित में कालवाह्य हो गयी है. कांग्रेस को छोड़ कर अलग दल बनाए नेताअों ने कांग्रेस की रीति-नीति को उससे ज्यादा बेहतर तरीके से अपनाया और कांग्रेस को अपने अधिकार क्षेत्र में उसकी रीति-नीति को उससे ज्यादा अपनाते हुए और उसमे जा​ित और धर्म का मुलाम्म्मा लगाकर अपने आप को कायाब बनाया. कारण कांग्रेस अपनी पुरानी लीक पर ही चलती रही. भाजपा इन सबसे पूरी तरह जुदा है. सेक्यूलर फ्रंट उसे समझ ही नहीं पा रहे है और जब तक समझेंगे तब तक समझने लायक नहीं रहेंगे. यही हाल मायावती का है, यही कांग्रेस का है, और यही अखिलेश और लालू का है. ममता भी ऐसी ही भ्रमावस्था में है जो और काफी कमजोर विकेट पर बैटिंग कर रही हैं आगे राम मालिक हैं.


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