स्कूल खोलना चुनौतीपुर्ण क्यों ?

इसमें संदेह नहीं कि संघर्ष मनुष्य की प्रकृति रही है और उसकी इसी विशेषता के बूते तमाम झंझावातों से लड़ते और पार पाते हुए दुनिया यहां तक पहुंच सकी है। वह प्राकृतिक आपदाएं हों या फिर समय-समय पर आने वाली महामारियों का कहर, मनुष्य ने उनका सामना किया और आगे का सफर तय किया है।

पिछले साल कोरोना को जब वैश्विक महामारी घोषित किया गया था, तभी से समूची दुनिया को किन हालात का सामना करना पड़ा है, यह सब जानते हैं। समूचा सामाजिक जीवन ठप होने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर हालत ऐसी कमजोर हो चुकी है कि उससे उबरने में शायद लंबा वक्त लगे। पिछले कुछ महीनों से इस महामारी का जोर कमजोर होने के साथ-साथ पूर्णबंदी में क्रमश: ढील दी जा रही है और आम जनजीवन की गतिविधियां फिर से सामान्य होने के क्रम में हैं। इसी संदर्भ में पिछले कुछ समय से सरकार से लेकर आम लोगों के बीच अलग-अलग स्तरों पर इस बात पर चिंता जाहिर की जा रही थी कि पूर्णबंदी की वजह से बंद हुए स्कूल कब खुलेंगे। महामारी और संक्रमण की गंभीर स्थिति के मद्देनजर निश्चित तौर पर स्कूलों को खोलना एक बड़ी चुनौती रही, लेकिन दूसरे कई क्षेत्रों में राहत देकर जब यह देख लिया गया कि जनजीवन के सामान्य होने की ओर बढ़ने के बावजूद कोरोना के मामले आमतौर पर काबू में हैं, तब इस मसले पर भी राय बनने लगी। अब कुछ राज्यों में सरकार ने स्कूलों को खोलने की इजाजत दे दी है, हालांकि उसमें कोरोना के संक्रमण से बचाव के लिए निर्धारित सभी नियम-कायदों का खयाल रखना होगा। यानी बच्चों की संख्या, स्कूल का समय, एक दूसरे से दूरी, मास्क लगाने आदि के लिए निर्देशों पर अमल सुनिश्चित करना होगा। कुछ अन्य राज्यों में हाल ही में इस ओर कदम बढ़ाने के बाद अब दिल्ली और राजस्थान में भी सोमवार से कुछ शर्तों के साथ स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई शुरू कराने की इजाजत दी गई है। महाराष्ट्र में स्कूल सत्ताईस जनवरी से खुलने की खबर है, हालांकि मुंबई के लिए फिलहाल इस पर सहमति नहीं बनी है। दिल्ली में अभी दसवीं और बारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए यह फैसला लिया गया है, मगर जो विद्यार्थी स्कूल जाएंगे, उन्हें अपने अभिभावक की लिखित अनुमति लेनी होगी। जाहिर है, स्कूलों को खोलने के फैसले तक आने के लिए सरकारों को कई स्तरों पर सावधानी के तकाजे का खयाल रखना पड़ा है।

दरअसल, स्कूल-कॉलेज या कोई भी शिक्षण संस्थान चूंकि सामूहिक उपस्थिति के परिसर होते हैं और ऐसी स्थिति में संक्रमण का खतरा अपेक्षया ज्यादा हो सकता था, इसलिए उन्हें बंद रखना जरूरी था। सही है कि स्कूल-कॉलेज बंद होने की हालत में बच्चों के नियमित शिक्षण पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, मगर सरकार ने इसकी भरपाई आॅनलाइन पढ़ाई के जरिए कराने की वैकल्पिक व्यवस्था की। हालांकि शिक्षा की गुणवत्ता के लिहाज से नियमित कक्षाओं के मुकाबले आॅनलाइन माध्यम की अपनी सीमा है।

यह हकीकत है कि देश की एक बड़ी आबादी आज भी कई स्तरों पर संसाधनों के अभाव में जी रही है। ऐसे तमाम लोग हैं, जिनके घरों में पढ़ने वाले बच्चों की आॅनलाइन कक्षाओं की जरूरतें पूरी करने के लिए कंप्यूटर, स्मार्टफोन और इंटरनेट जैसे संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में यह आशंका खड़ी हो रही थी कि अगर स्कूलों की बंदी लंबे समय तक खिंची तो बच्चों की एक बड़ी संख्या पढ़ाई-लिखाई से वंचित हो जाएगी। ऐसे में कोरोना पर काबू की स्थिति बनने के साथ अब स्कूलों को खोलने का फैसला लिया या है तो यह अच्छा है। मगर अभी भी संक्रमण की संवेदनशीलता के मद्देनजर बचाव के लिए सभी जरूरी एहतियात बरती जानी चाहिए।

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