अमेरिका की मंशा

तिब्बत के मसले पर अमेरिका एक बार फिर चीन को घेरने की कोशिश कर रहा है। ठीक इसी तरह की कोशिश वर्ष 2018 में भी की गई थी। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या सच में अमेरिका दलाई लामा की खंडित प्रतिष्ठा को स्थापित करना चाहता है या महज एक नौटंकी है, जो अंतरराष्ट्रीय दंगल में एक दूसरे को परेशान करने के लिए खेला जाता है। दरअसल पिछली सदी के छठे दशक से लेकर आज तक अमेरिका की कोई स्थायी तिब्बत नीति नहीं रही है। समय और परिस्थिति के साथ नियम बदलते रहे हैं।  इसलिए भारत सहित दुनिया के कई देश इस मुद्दे को लेकर चुप्पी साधे हुए हैं, लेकिन बाद की परिस्थितियों को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि यह कानून है क्या? चीन किसलिए इतना कुंठित है? भारत की क्या भूमिका होगी?

चीन और अमेरिका के बीच जारी तनातनी और बीजिंग की ओर से मिल रही चेतावनियों को दरकिनार करते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने उस कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं जो तिब्बतियों को उनके धर्मगुरु दलाई लामा के अगले उत्तराधिकारी को चुनने का हक देता है। ‘द तिब्बत पॉलिसी एंड सपोर्ट एक्ट’ को अमेरिकी कांग्रेस ने पिछले हफ्ते ही पास किया था जिससे चीन बुरी तरह चिढ़ गया और उसके विदेश मंत्रलय ने इस कानून को चीन के आंतरिक मामलों में दखलअंदाजी की कोशिश बताया था। चीन के विदेश मंत्रलय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने कहा, ‘हम अमेरिका से आग्रह करते हैं कि वह चीन के अंदरूनी मामलों में दखल न दे और इन नकारात्मक कानूनों पर हस्ताक्षर करने से बचे। बीजिंग अमेरिका के इस कानून को स्वीकार नहीं करता और तिब्बत से जुड़े मुद्दे हमारे घरेलू मामले हैं।’

इस नए अमेरिकी कानून पर ट्रंप के हस्ताक्षर करने से चीन की परेशानी बढ़ेगी, क्योंकि इस कानून से उन चीनी अधिकारियों पर वीजा पाबंदी लगाने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा जो अमेरिकी नागरिकों, सरकारी अधिकारियों और पत्रकारों को तिब्बत के निर्वासित आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा के गृह क्षेत्र तिब्बत जाने की अनुमति नहीं देते हैं। यह कानून अमेरिका के राजनयिकों, अधिकारियों व पत्रकारों को तिब्बत में जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। राष्ट्रपति द्वारा विधेयक पर हस्ताक्षर करने से पहले अमेरिकी सीनेट और प्रतिनिधि सभा इसे पहले ही मंजूरी दे चुकी है। ट्रंप ने यह कदम ऐसे वक्त में उठाया है जब चीन इस संबंध में कानून को लेकर अमेरिका से सख्त कूटनीतिक प्रतिरोध जता चुका है।

तिब्बत का मुद्दा अमेरिका और चीन के बीच समुद्री लहर की तरह कभी ऊपर उठता है तो कभी अचानक गुम हो जाता है। दूसरा महत्वपूर्ण आयाम भारत की भूमिका और तिब्बत के सामरिक महत्व को लेकर है। जब अमेरिका और भारत के बीच द्विपक्षीय संबंधों की गति में तेजी आती है, चीन को पसीना निकलने लगता है। कारण होता है तिब्बत। चीन की सामरिक सोच यह रही है कि तिब्बत पर अमेरिका अपने बूते उसे कोई भी बड़ा नुकसान नहीं पहुंचा सकता, क्योंकि अमेरिका चीन से बहुत दूर है। इसी कारण वर्ष 1950 के आसपास अमेरिका ने खंपा विद्रोहियों को हवा देकर तिब्बत को स्वतंत्र करने का असफल प्रयास किया था। नेहरू के चीन प्रेम या गुटनिरपेक्षता ने अमेरिकी पहल को भारत का समर्थन मिलने की राह बंद कर दी थी, इसलिए यह प्रयास फेल हो गया था। चीन मानता है कि भारत के पास इतना भी दम-खम नहीं है कि वह तिब्बत को आजाद करा सके। लेकिन चीन की बेचैनी तब बढ़ जाती है, जब भारत और अमेरिका एक साथ खड़े दिखाई देते हैं। उसे लगने लगता है कि तिब्बत खतरे में है और उसकी सुरक्षा को भेदा जा सकता है, तो वह मतभेद भुलाने और दोस्ती बढ़ाने की बात करता है।

इतिहास पर नजर डालें तो तिब्बत के मसले पर चीन, अमेरिका और भारत के रुख और आक्रामकता में कई बार समयानुकूल बदलाव आया है, लेकिन यह भी सही है कि डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद से अमेरिका-चीन के समीकरण बदलने लगे हैं। यह परिवर्तन भारत के लिए काफी अहमियत रखता है। पिछले वर्ष डोकलाम का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय पटल पर छाया रहा। भारत-चीन के बीच इस भिड़ंत के पीछे भी कारण तिब्बत ही है। दरअसल अरुणाचल प्रदेश को चीन तिब्बत का अंग मानता है। 16वीं और 17वीं शताब्दी में तिब्बत के लामा काफी शक्तिशाली हुआ करते थे। उनका प्रभाव क्षेत्र चीन समेत अरुणाचल प्रदेश के भी कई हिस्सों तक फैला हुआ था। यही कारण है कि जब भी सीमाई विवाद उत्पन्न होता है, चीन यह दलील देता है कि चूंकि तिब्बत चीन का क्षेत्र है, इसलिए तिब्बत के अंग से जुड़े हिस्से भी चीन का अभिन्न अंग हैं।

भारत स्वीकार कर चुका है कि तिब्बत चीन का अभिन्न अंग है। इस कबूलनामे ने हमारे लिए कई मुश्किलें पैदा कीं। पहला, ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान भारतीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए दोहरे बफर स्टेट की बिसात बिछाई गई थी। पहला तिब्बत और दूसरा नेपाल। तिब्बत पर चीन का अधिकार सुनिश्चित हो जाने के बाद नेपाल में चीन की सक्रियता बढ़ गई है। 

वर्ष 1980 के बाद से चीन नेपाल का मुख्य प्रेरक देश बन गया है। चीन और नेपाल के बीच पहले न तो कोई ऐतिहासिक संपर्क रहा है और न ही कोई सांस्कृतिक जुड़ाव रहा है। परिवहन संपर्क भी कभी नहीं रहा। अगर कोई कारण था तो वह था तिब्बत। आज भी चीन नेपाल के लिए जो कुछ भी कर रहा है, उसके पीछे मूल कारण तिब्बत ही है। ऐसे परिदृश्य के बीच अगर अमेरिका में तिब्बत का मसला गरमा रहा है तो यह भारत के लिए एक अच्छा मौका है। चीन भारत को घेरने की हरसंभव कोशिश में है। ऐसे में अमेरिका और चीन में तल्खी चीन को दबाव में लाने का काम कर सकती है। दलाई लामा का मध्यमार्गी रुख भी चीन को पसंद नहीं है। उन्हें नोबेल पुरस्कार भी शांति के लिए मिल चुका है। भारत में उनकी निर्वासित सरकार भी चलती है। दुनिया के देशों में उनकी खूब खातिरदारी भी की जाती है, इसलिए चीन चिंतित है। भारत और अमेरिका की मिलीभगत तिब्बत के मुद्दे पर बन सकती है। इसमें दोनों देशों का हित है।


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