चीन, पाक और अमेरिका में नया दौर

डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में बरकरार रहने के लिए सब कुछ किया.उन पर वह भी करने का कलंक लगा जो शायद आज तक किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति पर नहीं लगा. बावजूद इन सबके जो होना था वह हुआ और आज उनकी विदाई की बेला पर यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी िक हमारे देश के साथ उनके रिश्ते काफी ठीक रहे, लेकिन अपनी नीतियों, बड़बोलेपन और सनकी व्यवहार से उन्होंने दुनिया के कई देशों के साथ और अपने देश में जो कुछ होने दिया उसकी गूंज काफी दिनों तक रहने वाली है, नवागंतुक राष्ट्रपति जो बाइडेन और उपराष्ट्रपति हैरिस अपनी पारी की विधिवत शुरुआत कर चुके हैं. अभी तक हमें लेकर और हमारे चिर अशुभचिंतकों और दुश्मनों को लेकर उनका भी रुख अब तक के अमेरिकी प्रशासन के रुख से अलग नहीं दिख रहा है. शीत युद्ध की समाप्ति से लेकर आज तक हमारे और अमेरिका के बीच रिश्ते उतरोत्तर प्रगाढ़ होते रहे हैं. हमने अपने भरोसेमंद रूस के साथ अपने रिश्ते सामान्य रखते हुए यह हासिल किया है यह हमारे राजनय की विशेषता और परिपक्वता दर्शाता है, जिसका डंका आज दुनिया में बज रहा है. आज जिस तरह चीन का अपना विस्तारवादी एजेंडा आगे चलाने का इरादा है. 

जिस तरह वह दुनिया के छोटे देशों को अपने कर्ज के जाल में फंसाकर उसकी जमीन हड़पता है या पाकिस्तान की तरह उसे अपनी कठपुतली बनता है, अमेरिका और पूरी दुनिया जानती है़ आतंकिस्तान के नाम से कुख्यात पाकिस्तान किस तरह तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों और चेतावनियों के बावजूद भी सर से पांव तक आतंक के कारोबार से सना है, यह सर्वविदित है. दुनिया के दबाव और चेतावनियों के चलते पाकिस्तान आतंक के कारोबारियों पर कार्रवाई करने का ढोंग करता है वह भी दिन के उजाले की तरह दुनिया जानती है. इन सबके सामने यदि कोई चट्टान की तरह खड़ा है और इनका मुकाबला कर रहा है तो वह हमारा देश है. हमने अपने में वह दम खम पैदा किया है, जिससे हम इन्हें अपने दम पर सही राह दिखा सकते हैं, इनकी औकात और हद बता सकते है और बता रहे है, लेकिन इनके काले कारनामे हम तक ही सीमित नहीं हैं. चीन दुनिया का चौधरी बनने का आकांक्षी है तो आतंक का मक्का दुनिया के मुस्लिम देशों का मसीहा बनना चाहता है, ये दोनों की प्रवृत्तियां दुनिया के लिए कितनी घातक हैं इसको अमेरिका अच्छी तरह समझता है. इसलिए अपनी तमाम कमियों के बावजूद ट्रंप प्रशासन का रुख इन दोनों को लेकर और इनकी कुत्सित नीतियों को लेकर सदा आक्रामक रहा और हमारे साथ वह मजबूती से खड़ा रहा. आज भले ही अमेरिका का निजाम बदला गया है परंतु चीन-पाक वही है और उनकी कुनीति भी वही है, साथ ही जिस तरह संकेत नए अमेरिकी निजाम के विभिन्न किरदारों की ओर से आ रहे है वह भी चीन और पाक को लेकर उसी तरह सशंकित और सावधान हैं, जिस तरह ट्रंप प्रशासन था.

ऐसे में भले चीन या पाकिस्तान को यह उम्मीद हो कि अमेरिका का नया निजाम का रुख उनकी ओर कुछ नर्म होगा यथार्थ में ऐसा नहीं लगता. रही बात हमारी तो हमने पाक को ठीक करने का और चीन को अपनी सरजमीं से निकालने का बीड़ा किसी दूसरे के दम पर नहीं अपनी सेना और जनता के दम पर उठाया है. कारण हम सही हैं और हम ऐसा कर सकते हैं इसका भान भी चीन और पाक दोनों को है, और पूरी दुनिया को है तो अमेरिका का इन्हें लेकर क्या रुख होगा, हमारे लिए यह विचार या चिंता की बात नहीं है. इतना तय है कि इस बार हमने इन दोनों को यह एहसास करा दिया है कि हमारे संदर्भ में उनकी कोई भी हिमाकत नजर अंदाज नहीं की जायेगी और निर्णायक प्रतिकार का पात्र बनेगी, रही बात अमेरिका की तो दुनिया का जो सूरते हाल है उसके मद्दे नजर उसके लिए मानवता पर ग्रहण के समान इन दो देशों की अनदेखी करने की कोई संभावना नहीं नजर आती, उन्हें इन पर कड़ी और सख्त निगरानी रखनी होगी और जरूरत पड़ने पर कड़े कदम भी उठाने होंगे.

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