यह अक्षम्य और जघन्य अपराध है

गणतंत्र दिवस पर देश की राजधानी में किसान आन्दोलन के तहत ट्रैक्टर परेड के नाम पर जो कुछ हुआ यदि उसे आन्दोलन कहा जाय तो फिर दंगा किसे कहेंगे. राष्ट्रीय पर्व के अवसर पर जो कुछ भी वहां हुआ वह सर्वथा अनुचित और निंदनीय है जब पहले से ही ट्रैक्टरों परेड का रास्ता और कब से शुरू होना है यह समय तय था तब इसका उल्लंघन कैसे हुआ. जिस तरह से लोग दिल्ली के बीच पहुंचे लाल किले पर जिस तरह उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की झांकियों को निशाना बनाया गया, जिस तरह वहां बैरिकेड तोड़े गए, जिस तरह वहां खुले आम भाले, तलवार और फर्शे लहराए जा रहे थे यह साफ-साफ एक सोची समझी साजिश की ओर इशारा करता है. आंदोलन कारियों के लिबास कुछ और करने का इरादा दिखता है और उनकी  हिंसा और उपद्रव की मनसा साफ़ नजर आती है. इस देश का किसान ऐसा नहीं कर सकता, वह तो वैसे ही सदियों से दबा कुचला है. सरकार की ज़िम्मेदारी है की इसकी तह में जाएं और इसके लिए जो भी जिम्मेदार हों वे जवाबदेह बनाये जाएं और उन पर सख्त से सख्त कार्रवाई हो. इनका इरादा पूरी तहर अराजक स्थित पैदा करना था. दिल्ली पुलिस ने इस तरह के माहौल में भी जब आराजक और असामाजिक तत्व खतरनाक रूप से उत्तेजक कारगुजारी को अंजाम दे रहे हैं, इस तरह शहर में टैक्टर दौड़ा रहे थे मानो रेस भाग ले रहे हों, जिस संयम और समझादारी से स्थित पर नजर रखी और उसे नियंत्रित करने का काम किया भले ही ऐसा करने में उनके 300 से ज्याद जवान घायल हुए, काबिलेतारीफ है. यह आशंका पहले से ही थी कि इस परेड का असामाजिक तत्व और सीमा पर के हमारे शुभ चिन्तक फायदा उठा सकते हैं पुलिस ने खबरदारी भी बरती थी इसके बाद ऐसा कैसे हुआ इसकी सघन जांच जरूरी है. जिससे राष्ट्रीय पर्व के अवसर पर ऐसी देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने वाले उनके सूत्रधार सब कटघरे में खड़े किये जा सकें कारण यह कोई छोटी मोटी बात नहीं है यह तो देश की राजधानी में हिंसा और दंगा करने का अक्षम्य और जघन्य अपराध है. उन किसान नेताओं से भी जवाब मांगा जाना चाहिए जो परेड के शांतिपूर्ण होने की दुहाई दे रहे थे. क्या ऐसा ही विरोध शांतिपूर्ण विरोध हो जाता है जब जब देश के राजधानी का जनजीवन ठप्प कर दे और जत्थे-जत्थे में लोग हथियर लहराते हुए उसके मध्य तोड़ फोड़ करते नजर आयें. ऐसे कृत्य किसी भी सभ्य समाज के मुंह पर तमाचा है और दुनिया में देश की छवि पर बट्टा लगाने का कम करते है और हमारे पाकिस्तान जैसे कुत्सित मानसिकता के शिकार हर तरह से दिवालिया पड़ोसी को भी हमारे खिलापफ गाल बजाने का मौक़ा देते हैं. 

 तो जो कुछ भी हुआ बहुत बुरा हुआ है सरकार और पुलिस जो कार्रवाई कर रही है, एफआईआर दर्ज हो रहे हैं, गिरफ्तारियां हो रही हैं वह होना चाहिए, लेकिन इसके साथ-साथ इस पूरे प्रकरण की सांगोपांग जांच भी जरूरी है कारण यह तो पूरी दिल्ली में दंगा फ़ैलाने जैसा षडयंत्र लगता है आन्दोलन का मतलब धरने-प्रदर्शन या परेड के माध्यम से शांति पूरण तरीके से अपनी बात सरकार के सामने रखना है. जबसे आन्दोलन शुरू है सरकार कई राउंड बात कर चुकी है अभी बातचीत के दरवाजे बंद नहीं है सरकार प्रस्ताव पर प्रस्ताव दिए जा रही है किसान नेता सब कुछ ख़ारिज कर सिर्फ रद्द करने की हठधर्मिता पर उतारू है उनकी यह भूमिका पूरी तरह से आतार्किक और अव्यवहारिक है अभी वे तो दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं अब उनके नाम पर लोग दिल्ली में अराजकता फैलाने की हिमाकत करने लगे हैं. यह कदापि बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, ऐसे तत्वों पर और इसके जिम्मेदार लोगों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होना समय की मांग है. जहां हिंसा और गैरजिम्मेदारी का ऐसा नंगा नाच हो, जो ​एक महानगर का जनजीवन ठप्प कर दें और वह महानगर आपके देश की राजधानी हो तो इस पर चुप नहीं बैठा रहा जा सकता। सरकार को ऐसी कुप्रवृत्तियों पर स्थायी ​विराम लगाने के लिए हर संभव कड़े कदम उठाना चाहिए.


Post a comment

[blogger]

MKRdezign

Contact form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget