नस्लवादी दुराग्रहों से मुक्ती कब

रविवार को सिडनी में आस्ट्रेलिया और भारत के बीच क्रकिेट टेस्ट मैच में जिस तरह के हालात पैदा हुए, वह यह बताने के लिए काफी है कि वकिसित कहे जाने वाले देशों में भी कुछ लोग नस्लवादी दुराग्रहों से मुक्त नहीं हो सके हैं। अगर कोई भी व्यक्ति इस तरह की दुर्भावनाओं के साथ जीता है और उसे कुछ लोगों के बीच भी किसी स्तर की स्वीकार्यता प्राप्त है तो यह उस समूचे समाज के लिए शर्मिंदगी की बात है। गौरतलब है कि सिडनी टेस्ट में दूसरे और तीसरे दिन के खेल के दौरान नशे में धुत कुछ दर्शकों ने फील्डिंग करते जसप्रीत बुमराह और मोहम्मद सिराज पर नस्लवादी टिप्पणियां कीं और लगातार गालियां भी दीं। यह दूसरे देश की धरती पर जाकर खेलने वाले किसी भी खिलाड़ी या व्यक्ति के लिए बेहद अपमानजनक और दुखद है। स्वाभावकि ही दोनों खिलाड़ियों ने प्रबंधन को इस बात की जानकारी दी और ऐसी टिप्पणियां करने वाले लोगों को स्टेडियम से बाहर नकिाल दिया गया। लेकिन जब मामले ने तूल पकड़ा तब क्रकिेट आस्ट्रेलिया ने इन घटनाओं पर अपना आधकिारकि रुख स्पष्ट किया कि हर तरह के भेदभाव को लेकर हमारी नीति साफ है; अगर आप नस्लवादी गालियां देते हैं तो आस्ट्रेलियाई क्रकिेट में आपकी कोई जरूरत नहीं है। 

क्रकिेट आस्ट्रेलिया ने एक कदम और आगे बढ़ कर मेजबान होने के नाते भारतीय क्रकिेट टीम से माफी मांगी। आस्ट्रेलियाई क्रकिेट की ओर से ऐसी सख्त प्रतकि्रिया इसलिए राहत की बात है कि वहां ऐसी नकारात्मक प्रवृत्तियों को सांस्थानकि स्तर पर कोई समर्थन प्राप्त नहीं है। मगर सामाजकि स्तर पर यह न केवल आस्ट्रेलिया के लिए, बल्कि समूची दुनिया के लिए अफसोस और चिंता की बात है।  यों दुनिया के अलग-अलग देशों में आज भी नस्ल, क्षेत्र और समुदाय या जाति-समूहों को लेकर दुराग्रह या पूर्वाग्रहों से ग्रस्त धारणाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। खेल की दुनिया में भी गाहे-बगाहे ऐसे व्यवहार सामने आते रहे हैं, लेकिन अच्छा यह है कि इस पर औपचारकि रूप से उचित प्रतकि्रिया सामने आई और जरूरी कार्रवाई हुई है। करीब चार महीने पहले आस्ट्रेलिया के ही एक खिलाड़ी डेन क्रिश्चन ने कहा था कि उन्होंने अपने पूरे कॅरियर में नस्लवाद सहा है और अब उनके साथ खेलने वाले खिलाड़ी उनसे माफी मांगते हैं। दरअसल, नस्ल, जाति, समुदाय आदि को लेकर जिस तरह के पूर्वाग्रह देखे जाते हैं, वे व्यक्ति के सामाजकि प्रशकि्षण का हिस्सा रहे होते हैं और पैदा होने के बाद उनके भीतर जाने-अनजाने बैठा दिए जाते हैं।

अफसोस यह है कि आलोचनात्मक विवेक के साथ इन मसलों पर विचार करने की कोशिश नहीं की जाती है। नतीजतन, कोई व्यक्ति कई बार निजी या फिर सार्वजनकि रूप से भी किसी अन्य नस्ल, जाति या समूह के लोगों को कमतर करने वाली या नफरत से भरी टिप्पणियां करके आहत करने की कोशिश करता है। जबकि समझने की बात यह है कि ऐसे पूर्वाग्रह या कुंठा पालने वाला कोई भी व्यक्ति सभ्य होने की कसौटी पर बहुत पिछड़ा होता है। इंसानों के भीतर इंसान के लिए समानता की संवेदना ही सभ्य होने की कसौटी है। आज दुिनया में हर जाति, वर्ग और विभिन्नय  राष्ट्रीयता के लोंगो का डंका बज रहा है। समाज में रूप रंग या जाति के आधार पर भेदभाव आदमयुगीन परकिल्पना थी। 21वीं सदी के सभ्य समाज में अपनी धरती पर किसी दूसरे देश से आए व्यक्ति  पर उसके रूप-रंग को लेकर टिप्पणी करना हर दृष्टि से निंदनीय और अक्षम्य अपराध है। खुशी की बात है कि आस्ट्रेलिया में हुई इस टिप्पणी का हमारे देश के स्तर पर और अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी कड़ी आलोचना हुई है और इसका सख्त प्रतकिार किया जा रहा है। क्रकिेट प्रबंधन से जुड़े राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय संगठनों ने भी कड़ा रूख अख्तियार쀆ఀ किया है। उम्मीद है क्रकिेट आस्ट्रेलिया और उनकी सरकार भी इन नाकारात्मक प्रवृतियों के खिलाफ कड़ा कदम उठाएगी जिससे बार-बार होने वाली ऐसी अवांछनीय गतिविधियों पर विराम लग सके और इनकी पुनरावृति न हो।

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