ट्रंप की शोकांतिका

अमेरिका अपने आपको दुनिया में प्रजातंत्र का संरक्षक मानता है. मानवाधिकार और प्रजतंत्र को लेकर  उसके लोग बड़ी- बड़ी बातें  करते रहे हैं.दूसरे देशों पर उंगली उठाते रहते हैं, परन्तु जिस  तरह गुरुवार को वहां मौजूदा राष्ट्रपति के उकसाने पर लोगों की भीड़ ने वहां की विधायिका को बंधक बनाने  का प्रयास   किया और सांसदों को अपनी  हिफाजत के लिए इधर उधर  छिपना पड़ा.यह  उन दावों के चीरहरण के समान है. बडबोले और अपनी चलाने के माहिर ट्रंप ने  जिस तरह पिछले चार  साल अमेरिका का शासन चलाया .जिस तरह की खाई वहां समाज में देखने को मिल रही है,जिस  तरह अमेरिका 

कोरोना का मक्का बन गया और अभी भी महामारी का बेलगाम  दौर जारी है और जिस तरह चुनाव हारने के बाद  भी  वह अपनी हार को जीत में  बदलने की शर्मनाक और अतार्किक कोशिश करते रहे हैं और उत्तेजक भाषण और बयान दे रहे थे तो  यही होना था.उनकी पारी का यह शर्मनाक उप संहार, जिसमे देश की विधायिका को ही  निशाना बनाया गया.अमेरिका के इतिहास में एक काले अध्याय  के रूप में दर्ज होगा.अपनी कार्यशैली और आउट  ऑफ बॉक्स तरीकों से अब तक तो ट्रंप दुनिया को चौंकते रहे हैं. इस बार तो उन्होंने अपने कारनामे  से दुनिया को भौंचक्का कर दिया है.दुनिया हतप्रभ है कि अमेरिका में  भी ऐसा हो सकता है. ट्रंप ने अपने कलंक से अपने को इतिहास में अमर कर दिया है. यही नहीं काले-गोरे की जो खाईं उनके कार्यकाल में बनी है, जो  समाज को बांट रहे हैं और जिस  तरह वहां के  सुरक्षा बलों पर यह आरोप लगा है कि पिछले दिनों अश्वेत लोगों के दंगे में उन्होंने बड़ी कड़ाई दिखाई, जबकि गुरुवार को आन्दोलनकारियों के साथ सेल्फी निकाल रहे थे. कारण  उनमे  अधिकांश श्वेत थे.आज अमेरिका कोरोना से बेहाल है.श्मशान गृहों में दफनाने की जगह नहीं है.लोग भूखों मर रहे हैं और अवाम बंटी  हुई है.यह सब तब हुआ, जब ट्रंप देश के राष्ट्रपति  हैं . राजनैतिक विश्लेषकों का यहां तक कहना है कि उनकी हार का सबसे बड़ा कारण  उनका और उनकी टीम का   कोरोना का कुप्रबंधन था.चुनाव में मिली हार को प्रजातंत्र की उदात्त परम्पराओं के अनुरूप स्वीकार करने के बावजूद  उस पर सवाल खड़ा करना ही सही नहीं था. भीड़ को संसद घेरने के लिए उकसा कर और जिस तरह की हिंसा और तोड़फोड़ का माहौल वहां दिखा है, उसका कारण बनकर कर ट्रंप ने गैर जिम्मेदारी की सारी हदें पा कर दी हैं.यह अनायास ही नहीं कि इससे आहात अमेरिका का एक बड़ा वर्ग उन्हें हटाने  की मांग कर रहा है और  पूरी   दुनिया में इसकी निंदा हो रही है . यह अच्छी  बात है की कोई भी सांसद उनकी गीदड़भभकी में नहीं आया और इतना सब होने के बाद विधायिका ने बाईडेन की जीत पर मुहर लगाकर अपने संवैधानिक  दायित्व का निर्वाह किया.  उसके बाद ट्रंप भी शांति पूर्ण  सत्ता हस्तान्तरण को राजी हो गये हैं,  तो जब यही करना था तो फिर गुरुवार का तमाशा क्यों किया गया,  इससे भले उनके अहम को तुष्टि मिली हो पर उनका और अमेरिका का उन्होंने जो दुनिया में तमाशा बना दिया, उसकी  भरपाई कैसे  होगी.  अमेरिका जो दुनिया भर के देशों पर  उंगली उठाता है, ऐसा करने का नैतिक कलेवर  कहां से लाएगा.  इस पर भी ट्रंप को और उनके समर्थकों को विचार करना चाहिये .व्यक्ति ऊंची कुर्सी पर बड़ी मेहनत से बैठता है, उससे ऐसे आचार -विचार और व्यवाहर की उम्मीद की जाती है, जिससे जिस कुर्सी पर वह बैठा है उसका मान बढ़े और उसके कार्यों से देश,समाज  जिसका वह नुमाईंदा है, उसका भी  नाम रोशन हो. ट्रंप इन दोनों विन्दुओं पर विफल साबित हुए हैं, यह उनके कार्यकाल  की शोकांतिका ही कही जायेगी .वह आने वाले राष्ट्रपति के लिए चुनौतियों का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं. देखते हैं अमेरिका इन सब से कैसे पार पाता हैं.


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