मरते निर्दोष और चीत्कार करते परिजन

उत्तरप्रदेश के गाज़ियाबाद जिले के मुराद नगर में एक श्मशान घाट की छत गिरने से 25 लोगों की मौत जितनी दुखद है उतनी ही विचारणीय भी। यह घटना जताती है कि  भ्रष्टाचार का दीमक किस तरह पूरी अव्यवस्था को चाट गया है  और किस तरह हमारा सिस्टम काम करता है। उसमें मानवीय संवेदना है कि नहीं अब यह भी विचार करने की जरूरत है। मुगलों और अंग्रेजों तथा राजा-रजवाड़ों द्वारा किए गए निर्माण कार्य सैकड़ों वर्षों से अपनी शान से खड़े हैं। इनमें कई निर्माण मंदिर और किले हजारों साल पुराने हैं और यह तबके हैं जब निर्माण की ऐसी आधुनकि साधन- सुिवधाएं नहीं थीं,  जैसे कि वर्तमान में हैं। जबकि आज देश में एक नहीं कई राज्यों में ऐसे समाचार सुर्खियाँ बनते हैं, जब उद्घाटन के पहले ही पुल, भवन ढह जाते हैं और इस पर कोई लगाम लगती नहीं दिख रही है। नेता, नौकरशाह और ठेकेदार का गठजोड़ बहुत पुराना और कुख्यात है और यह इतना शक्तिशाली है कि इसके खिलाफ की गई कोई शकिायत असर नहीं छोड़ती। जैसे उपरोक्त मामले में हुआ है। तीन महीने पहले राज्य के नगर वकिास के आला अधकिारी सहित तीन अधकिारियों के पास लिखित शकिायत की गयी थी कि उक्त छत के निर्माण में घटिया सामान और मसाले का उपयोग किया गया है। बावजूद इसके इस मामले में कुछ नहीं किया गया और किसी की अंतिम विदाई देने गये लोग असमय काल के गाल में समा गये और अपने परिवार को रोता-बिलखता छोड़ गये।  यह राहत की बात है कि इस घटना की दखल स्वयं राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने ली है और मुख्यमंत्री योगी अािदत्यनाथ ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। इस घटना के दोषी अधकिारियों और ठेकेदार पर रासुका के तहत कार्रवाई हो रही है। मृतकों के परिवारों को हर संभव मदद-सहायता  उपलब्ध कराई जा रही है। यह सब ठीक है और सराहनीय है। इसके साथ यह भी सही है कि ऐसी दुखद और त्रासद घटनाओं की वारम्बारता पर कोई  फर्क पड़ेगा, ऐसा नहीं लगता। मोदी-योगी युग में अब तक पवित्र मानी जाने वाली गाय नौकरशाही को जवाबदेह बनाने के लिए कड़े कदम उठाये गए हैं। कदाचार और भ्रष्टाचार के लिए अपने कर्तव्य के निर्वहन में लापरवाही के लिए कइयों को लाइन हाजिर किया गया है। कइयों को समय से पहले सेवानिवृत्त किया गया है।  बावजूद इसके ऐसे हादसों का होना यह जाहिर करता है कि सड़ांध बहुत गहरी है और इसके लिए जो कुछ अभी तक किया गया है वह नाकाफी है।  इस तरह के  सार्वजनकि निर्माणों के लिए केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों के साथ मिलकर कोई ऐसी देशव्यापी आचार संहिता िवकसित करनी चािहए जो पूरे देश में लागू हो और उसका कठोरता से क्रियान्वयन हो। उसका किसी स्तर पर उल्लंघन कठोर कार्रवाई का पात्र हो तो तभी भले कोई बात बनेगी। कारण नेता तो आता-जाता रहता है, पर नौकरशाही स्थायी है। वह एक बार नियुक्त होने के बाद 30 -40  बरस तक अपने पद पर बना रहता है। यदि वह अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करता है तो फिर घटिया निर्माण नहीं होंगे। आज जिस शहर में देखो अवैध निर्माणों की भरमार है। कोई हादसा होता है, तो कुछ दनि तक हो हल्ला होता है। उसके बाद फिर सब पुराने ढर्रे पर चलने लगता है और यही समस्या का सबसे बड़ा कारण है। हादसों को एक तरह से निमंत्रण है।  कोई भी ऐसा दस्ता भी राज्य सरकार को बनाना होगा, जिसमें ऐसे विशेषज्ञ हों, जो समय-समय पर ऐसे निर्माणों का औचक निरीक्षण करते रहें और उसमें कुछ भी उल्टा-सीधा पायें तो उस पर कड़ी कार्रवाई करें। जब तक हर तरह से जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होती तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे और मानवता कलंकित होती रहेगी तथा निर्दोष लोग मारे जाते रहेंगे एवं उनके परिजन चीत्कार करते रहेंगे। इसेे रोकना होगा। इस घटना को लेकर राज्य सरकार गंभीर है, यह एक अच्छी बात है।


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