कांग्रेस निष्ठा और भक्ति के साथ क़ाबलियत को भी दे तरजीह

कांग्रेस कार्य समिति की बैठक शुक्रवार को पुन: जून तक कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव कराने की घोषणा के साथ समाप्त हो गयी. अध्यक्ष का चुनाव जल्दी संपन्न कराने की जी-23 के कुछ नेताओं की मांग गांधी परिवार के निष्ठावानों की जोरदार मुखालफत के सामने परवान नहीं चढ़ सकी. दोनों गुटों के नेताओं में गरमागरमी का नजारा भी दिखा परन्तु अंततः अागामी जून तक कांग्रेस का नया अध्यक्ष चुन लिया जाएगा यह बात आम सहमति से मान ली गयी. पार्टी अध्यक्ष का चुनाव जून तक टालने के पीछे जो महत्व पूर्ण कारक बताया गया उसमे आगामी पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव प्रमुख है. अभी पार्टी को इन चुनावों पर ध्यान केन्द्रित करना है इसलिए अभी अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो सकता. यह सही है लेकिन जिस तरह पार्टी आज असंतुष्टों और निष्ठावानों में विभाजित है. संगठन में व्याप्त मरगल को लेकर पार्टी के बड़े नेताओं जिन्हें जी -23 के नाम से जानते है ने जो असंतोष व आक्रोश व्यक्त किया था क्या उसका समाधान हो गया है? कारण जिस दुरावस्था, नेतृत्व की कमी का उल्लेख अपने पत्र में उन नेताओं ने किया था. पार्टी को जो चुनाव दर चुनाव हार मिल रही है उसका सबसे बड़ा कारण वही है. राहुल गाँधी रोज सुबह उठ कर कोई ना कोई तीखी टिप्पणी भाजपा की केंद्र सरकार या प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी या उनकी सरकार की नीतियों पर कर देते है. इसके बाद दूसरे दिन सुबह तक चुप्पी रहती है उसके बाद फिर वे दूसरे दिन दूसरा बयान दे देते है जिस पर अधिकांश बड़े नेता या तो चुप रहते है या हंसते है क्या ऐसे ही पार्टी चलेगी? 

गत लोकसभा चुनाव हारने के बाद राहुल गाँधी ने इस्तीफ़ा दे दिया. काफी समय उनकी मान -मनौव्वल में गया.  वे नहीं माने. उसके बाद सोनिया गाँधी अंतरिम अध्यक्ष बनी तबसे भी काफी समय बीत गया है इस दौरान पार्टी चुनाव दर चुनाव हारती जा रही है कोई मंथन या चितन नहीं हुआ. आधे से ज्यादा देश में पार्टी का सगंठन तहस नहस है उसे चुस्त दुरुस्त करने का कोई कदम नहीं उठाया गया ऊपर कुछ बदलाव किया गया लेकिन ऐसा गुटवाद हावी है कि वे भी ठीक से काम नहीं कर पा रहे है 

भाजप ने राजनीति, का चुनाव लड़ने का, प्रचार का तौर तरीका ही बदल दिया है. साथ ही कांग्रेस की अब तक की रीति नीति और शैली पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है. जिन मुद्दों को लोग यह मान कर चलते थे कि इनका कभी समाधान ही नही होगा आज उनका समाधान हो गया है और नए दौर की शुरूआत हो गयी है. कार्यकर्ता उसकी काट कैसे करें यह ही नहीं समझ पा रहे हैं और पार्टी एक पूर्ण कालिक अध्यक्ष तक नहीं चुन पा रही है जो इन इन सब मुद्दों पर लोगों से अपने नेताओं से सलाह-मशविरा कर पार्टी की भूमिका तय कर सके जिसका अनुकरण देश भर के कार्यकर्त्ता कर सकें. वह दिन अब लद गए है जब सत्ता पक्ष की गलतियों से कांग्रेस को बिना कुछ किये धरे उसकी सत्ता की लाटरी लग जाती थी. मोदीयुग में पांच साल सत्ता में रहने की बाद भी सत्ताधारी दल की सीटें उसका मत बैंक बढ़ता है और विपक्ष को इतने भी मत नहीं मिलते कि उसे विपक्ष के नेता का भी पद मिल सके. कांग्रेस को यह एहसास ही नहीं है कि उसकी पार्टी की हालत कितनी खराब है इसका इलाज फैसले टालने और बयान बहादुरी दिखाने से नहीं होगा उसके लिए पार्टी को विचार -मंथन कर नीचे से ऊपर तक संगठन को चुस्त दुरस्त करना होगा. 

पार्टी में विचारधारात्मक स्पष्टता लानी होगी. यह सिर्फ खानदानी भक्ति और निष्ठा से नहीं होगी उकसे साथ साथ कड़े निर्णय लेने होंगे, गुटवाद पर सख्त कदम उठाने होगे और कार्यकर्ताओं को स्पष्ट एजेंडा देना होगा, खाली तीखा बोल कर और जिम्मेदारी से भाग कर बात नहीं बनेगी और इन सबके पहले देश में गाँव से लाकर दिल्ली तक संगठन का ढांचा सही करना होगा तभी बात बनेगी वरना पार्टी जो अभी राजनीति की मझधार में हिचकोले खा रही है कब डूब जायेगी पता नहीं चलेगा. तब करने के कुछ नहीं बचेगा. निष्ठा भक्ति के साथ काबलियत और कारगुजारी को तरजीह देना कांग्रेस को सीखना होगा. बिना इसके उसका अपने ​बीते हुए दिन वापस लाने का सपना हकीकत में कदापि तबदील नहीं होगा. जिस तरह पार्टी चल रही है उससे पारस्प​​िरक कलह और विरोध बढ़ेगा.

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