किसानों को 'सुप्रीम' फार्मूला नामंजूर


नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही नए कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाकर किसानों से बातचीत के लिए कमिटी गठित कर दी है, लेकिन सरकार और आंदोलनकारी किसानों के बीच का संघर्ष खत्म होने की अब भी कोई गुंजाइश नहीं दिख रही है। ऐसा इसलिए क्योंकि आंदोलनकारी किसान संगठनों के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी ने भी कमिटी की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़ा कर दिया है।

राकेश टिकैत ने कमिटी के सदस्यों पर उठाए सवाल

टिकैत ने एक बातचीत के दौरान कमिटी के सदस्यों के नाम लेते हुए कहा कि ये सभी बाजारवाद और पूंजीवाद के समर्थक हैं। उन्होंने कहा कि इन्होंने ही तो कृषि सुधार के लिए इस तरह के कानून लाने की सिफारिश सरकार से की थी तो इनसे किसानों के हित में सोचने की क्या उम्मीद की जा सकती है।

सरकार की राय

उधर, सरकार का कहना है कि सरकार ने उसकी इच्छा के खिलाफ कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगा दी है। उन्होंने 26 जनवरी को किसानों की ट्रैक्टर रैली की योजना को भी देश की छवि के लिए ठीक नहीं बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा

ध्यान रहे कि एससी ने एक समिति बनाने को कहा है, जिसमें ज्यादातर किसान शामिल होंगे, जो कानूनों के खिलाफ किसान यूनियनों की शिकायतों को सुनेंगे। चीफ जस्टिस बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, हम तीन कृषि कानूनों के कार्यान्वयन को अगले आदेश तक स्थगित करने जा रहे हैं। प्रधान न्यायाधीश ने कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, डॉ. प्रमोद कुमार जोशी, अनिल धनवट और बीएस मान को समिति में शामिल किया है, जो नए कृषि कानूनों के संबंध में किसानों के मुद्दों को सुनेंगे। शीर्ष अदालत ने दिल्ली पुलिस के आवेदन पर नोटिस भी जारी किया, जिसमें किसानों को राष्ट्रीय राजधानी में गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली आयोजित करने से रोकने की मांग की गई है।


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