कानून का राज जरूरी

बहार के सीतामढ़ी जिले में शराब माफिया और पुलिस के बीच टकराव और उसमें एक दारोगा की मौत की खबर यह बताने के लिए काफी है कि राज्य में शराबबंदी और सुशासन की हकीकत क्या है! राज्य में शराब की बिक्री या उसका सेवन कानूनन अपराध है। इसकी रोकथाम के लिए पुलिस अक्सर छापेमारी करती रहती है। इसी क्रम में बुधवार सुबह सीतामढ़ी जिले में मेजरगंज के कोआरी गांव में जब पुलिस की एक टीम छापा मारने पहुंची तो वहां शराब माफिया ने अचानक गोलीबारी शुरू कर दी। इसमें एक दारोगा और एक चौकीदार को गोली लगी। बाद में इलाज के लिए ले जाते समय रास्ते में दारोगा की जान चली गई। दिखने में यह अपराधियों और पुलिस के बीच मुठभेड़ की एक खास घटना लगती है। लेकिन सच यह है कि राज्य में हाल के वर्षों में अपराधियों का मनोबल जिस कदर बढ़ा है, उसके मद्देनजर पुलिस पर अपराधियों का यह हमला हैरान नहीं करता है। एक अन्य घटना में राज्य के बेगूसराय जिले में भी शराब माफिया के खिलाफ छापेमारी करने गई पुलिस पर स्थानीय लोगों ने ईंट-पत्थरों से हमला कर दिया और कई के साथ मारपीट भी की। इस तरह की घटनाएं राज्य में कानून-व्यवस्था की लगातार गिरती दशा को ही दर्शाती हैं। कहने को राज्य में नीतीश कुमार की सरकार ने शराब पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। लेकिन ऐसी खबरें आम रही हैं कि कानूनी तौर पर शराब के खिलाफ घोषित सख्ती के बावजूद राज्य के अलग-अलग हिस्से में लोगों को दो या तीन गुनी ज्यादा कीमत चुका कर शराब हासिल करने में ज्यादा बाधा का सामना नहीं करना पड़ता है। अगर ऐसी खबरों का कोई आधार है तो कानून के शासन को किस तरह देखा जाएगा? यों पिछले कई सालों के दौरान लगातार छापे और उसमें भारी पैमाने पर शराब की बरामदगी की खबरें आती रही हैं। सवाल है कि अगर शराब पर कानूनी तौर पर पाबंदी है, तो अलग-अलग ठिकानों पर इतनी भारी मात्रा में शराब कैसे मौजूद होती है? फिर यह कैसे संभव हो रहा है कि छापा मारने गई पुलिस पर ही अपराधी भारी पड़ रहे हैं और ड्यूटी करते हुए किसी पुलिसकर्मी को अपनी जान तक गंवानी पड़ रही है? छापा मारने वाली टीम को बुलेट प्रूफ जैकेट या दूसरे सुरक्षा संसाधन मुहैया कराने को लेकर पुलिस महकमा इस हद तक लापरवाही कैसे बरत सकता है?

 गौरतलब है कि राज्य में जब शराबबंदी लागू हुई थी तो इसके पीछे वहां व्यापक पैमाने पर महिलाओं की ओर से उठाई गई यह मांग मुख्य वजह थी, जिसमें उन्होंने शराब की वजह से अपने परिवारिक और सामाजिक जीवन तबाह होने की शिकायत की थी। शराब पर पाबंदी में महिलाओं और गरीब तबकों के जीवन में सुधार लाने की एक आदर्श धारणा मौजूद थी।  शुरुआती दौर में शराब के खिलाफ बरती गई सख्ती के बाद इसका सकारात्मक असर देखा गया, जब महिलाओं और समाज के कमजोर तबकों ने अपने जीवन-स्तर में काफी राहत और सुधार को महसूस किया। मगर भ्रष्टाचार और अनदेखी की वजह से कालाबाजारी के जरिए शराब की पहुंच फिर से आम होने लगी। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर भी महुआ से या दूसरे तरीकों से देशी शराब बनाई जाने लगी। पहले तो इस तरह की गतिविधियों और भ्रष्टाचार को लेकर आंखें मूंद ली गर्इं और शिकायतें बढ़ने पर जब पुलिस और प्रशासन ने सख्ती बरतनी शुरू की तो अब शराब माफिया अपना रुख दिखाने लगा है। दूसरे अपराधों के मामले में भी राज्य की क्या हालत हो चुकी है, यह किसी से छिपा नहीं है। सवाल है कि क्या सुशासन का केवल नारा लगाने भर से अपराधों पर काबू पाया जा सकता है?


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