जैसे को तैसा

चीन ने नवें दौर की बात के बाद पीछे हटना शुरू कर दिया है. पिछले मई से शुरू इस गतिरोध के बाद आयी यह खबर जरूर राहत भरी है, लेकिन इससे आनंदातिरेक में गोते लगाने लगें ऐसी कोई बात नहीं है. चीन और पाकिस्तान हमारे ऐसे शत्रु हैं, जिन पर यह कहावत एकदम सटीक बैठती है कि ‘सौ -सौ जूते खाए तमाशा घुस कर देखें.’ यह कब मिमियाने लगें और कब छूपकर घुसपैठ करने लगे कहा नहीं जा सकता. कारण इनकी कोई नीति नहीं है और इनके लिए कोई नियम नहीं है, इन्हें तभी समझ आता है ,जब इनकी पूंछ दबी हो. 

भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में इनसे डील करने के उसके पूर्व के तौर तरीके में व्यापक बदलाव लाया और सेना के तीनों अंगों को भी किसी भी संभावना से निपटने के लिए आवश्यक साजो-सामान से तैयार किया और दोनों सीमाओं पर बुनियादी ढांचा खड़ा करने का काम युद्ध स्तर पर शुरू किया गया. सेना हमारी सदा से बहादुर रही है, लेकिन उसको अपनी बहादुरी दिखाने के लिए जिस तरह की छूट चाहिए थी नहीं मिल रही थी. जो साजो सामन चाहिये थे, नहीं मिल रहा था. मोदी युग में दोनों मिली और उसका असर चीन को उसकी डोकलाम में की गयी,अनाधिकार चेष्टा के समय से ही दिखा और पाकिस्तान को सर्जिकल स्ट्राइकों से दिखा. चीन ने डोकलाम में मुंह की खाने के बाद भी और पीछे हटने को बाध्य किये जाने के बाद भी सबक नहीं लिया. रही बात पाक की तो वह डरा हुआ है, लेकिन अपनी हमारे प्रति बदनीयती दिखाने और षडयंत्र रचने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ रहा है. 

चीन ने डोकलाम में पटखनी खाने और भारत के बदले निजाम और उसके बदले तौर तरीकों का स्वाद चखने के बाद दुबारा लद्दाख में दुस्साहस किया और गलवान के कड़े जबाब और हर तरह से उसका मुकाबला करने की भारत के खुले संकल्प के सामने लम्बे गतिरोध और तनातनी के बाद अब उसे सद‍्बु​िद्ध आती दिख रही है और वह घुटने टेकता नजर आ रहा है. सेना वापस हो रही है यह अच्छी बात है, लेकिन इस बार उसे कोई ढील देने की जरूरत नहीं है, जब तक वह हमारी एक-एक इंच जमीन से वापस नहीं हो जाता, तब तक उस पर भरोसा किया जाय ऐसा उसका इतिहास नहीं रहा है. 

आजादी की बाद से लेकर आज तक जब भी उसने दोस्त बनने का दिखावा किया सिर्फ और सिर्फ धोखा किया है और आज जो उसकी नस ढीली नजर आ रही है,उसका कारण वह सुधर गया है या उसकी नियति बदला गयी है ऐसा नहीं है. यह भारत की सामरिक क्षमता और कूटनीतिक कौशल का डंका है जो उसे एहसास करा रहा है कि वह हमसे ना सामरिक से पार पा सकता है और ना ही कूटनीतििक रूप से. हमसे उलझने पर उसकी हालत उसकी कठपुतली पाकिस्तान से ज्यादा खराब होगी. कारण चीन ने अपनी विस्तारवादी और दुनिया का चौधरी बनने वाली नीति से बहुतों को दुखाया है और दुनिया के बड़े से बड़े देशों को चौंकाए हुए है, जो मौके की ताक में हैं. उसकी घेराबन्दी पूरी है दुनिया सिर्फ इस इंतजार में है कि कोई एक गलती करे और हमने तो यह कह ही दिया है कि हम चीन और पाक से अपनी एक-एक इंच जमीन वापस लेंगे चीन को यह एहसास डोकलाम में ही हो चुका था. 

अब लद्दाख में तो उसे पूरी तरह समझ आ जाना चाहिए कि आज का भारत किसी की ओर अपनी उंगली टेढ़ी नहीं करता लेकिन यदि कोई उसे उंगली दिखाता है तो उसे तोड़ देता है. चीन मोर्चे पर यह पीछे हटना एक शुभ संकेत है, लेकिन जब तक चीन पूरी तरह पीछे नहीं हट जाता और हमें यह पूरी तरह एहसास नहीं हो जाता तब तक उसे कोई ढील देना या निश्चिंत हो जाने के लिए कोई जगह नहीं है. चीन और पाकिस्तान सिर्फ और सिर्फ जैसे को तैसा की भाषा ही समझाते है तो जब तक वह हमारी एक इंच-इंच जमीन जिस पर वह नाजायज काबिज है हमे सुपुर्द कर सही राह पर चलना नहीं शुरू कर देते हमें उन्हें जैसे को तैसे से भी ज्यादा जबाब देते रहना होगा तभी बात बनेगी.

Post a comment

[blogger]

MKRdezign

Contact form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget