कांग्रेस में धधकता असंतोष

पांच राज्यों में चुनाव का शंखनाद हो चुका है. सारी पार्टियां चुनावी समर में दो-दो हाथ करने की तैयारियों में जोर शोर से जुट गयी हैं. कांग्रेस के युवराज और अन्य नेता भी चुनावी तैयारियों में मशगूल हो गए हैं. बावजूद इन सबके कांग्रेस में 

जी-23 गुट कांग्रेस आलाकमान को राहत देने के मूड में है, ऐसा नहीं लगता , जिस तरह शनिवार को भगवा पगड़ी पहनकर वरिष्ठ कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद के अभिनंदन समारोह में जी-23 के वरिष्ठ नेताओं ने अपने बगावती तेवर दिखाएं थे, उससे यही लगता है कि यह आग जो कांग्रेस में उसकी होती खस्ता हालत के चलते लगी है, वह आसानी से नहीं थमने वाली है. इन बागियों में अधिकांश नेता ऐसे हैं, जिन्होंने पार्टी के स्वर्णिम काल में जी भरकर सत्ता सुख भोगा है और 2014 के लोकसभा चुनाव के समय पार्टी के मुख्य किरदारों में से एक थे. 

आज भी इनमें अधिकांश लोकसभा या राज्यसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और अपने-अपने राज्यों में भी निर्णायक जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. स्वयं गुलाम नबी आजाद अभी चंद दिन पहले तक राज्यसभा में पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे, तो यह पार्टी की इस दुरावस्था के लिए जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकते, इसका भान भी इन नेताओं को है. शायद इसीलिए पिछले लम्बे समय से पार्टी को सशक्त करने के लिए पूर्णकालिक अध्यक्ष और निचले स्तर तक पार्टी संगठन का चुनाव कराकर संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने की वकालत कर रहे हैं. इसके बाद आलाकमान हरकत में आया इनके साथ बैठकें की और इसके बाद कार्यसमिति की बैठक कर चुनाव जून तक टाल दिया. टालने के पीछे जो कारण बताया गया, वह इन पांच राज्यों में चुनाव, जिनकी घोषणा हो चुकी है. उसके बाद भी अभिनंदन पार्टी की आड़ में असंतुष्टों का शक्ति प्रदर्शन कांग्रेस में अन्दर ही अन्दर काफी कुछ गड़बड़ होने का संकेत दे रहा है. अब यह काफी दिलचस्प होगा कि  कांग्रेस आलाकमान इससे कैसे निपटता है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस अपने अब तक के सबसे खराब दौर से गुजर रही है. स्वाभाविक है, इससे ऊपर से नीचे तक के कार्यकर्ताओं में खलबली और हलचल है. कांग्रेस आलाकमान इस मरगल से पार्टी को निकालने के लिए कोई गंभीर प्रयास करता या कड़ा कदम उठाता नहीं नजर आ रहा है. आज पार्टी की नीति उसकी विचारधारा सब पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है. देश के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर भी पार्टी में स्पष्टता का अभाव है. देश के अधिकांश राज्यों में पार्टी का संगठनात्मक ढांचा तहस-नहस है. इन सब पर गंभीर कदम उठाने की जरूरत है, इन पर सिर्फ बयान बहादुरी से या भाजपा नीत केंद्र या राज्य सरकारों को कोसने से या आरोप लगाने से काम नहीं चलेगा. कारण मोदी युग में ऐसे-ऐसे निर्णय हुए है, ऐसे साहसिक कदम उठाये गए हैं, जो कांग्रेस असंभव बताती थी.

अब उनपर कार्यकर्ता किस मुंह से बात करें इस पर विचार करने की बजाय सिर्फ उलटे-सीधे वक्तव्यों से कांग्रेस की हालत नहीं सुधरेगी, उलटा कार्यकर्ताओं की हताशा बढ़ेगी और नेता बेचैन होगें. आज वही बेचैनी और अपनी भविष्य के प्रति चिंता ही लोगों को आलाकमान के प्रति आक्रामक बना रही है. यह वही लोग हैं, जो एक जमाने में आला कमान के करीबी थे और आज जब उन्हें लग रहा है कि आलाकमान उनकी राजनीतिक नैया नहीं पार लगा सकता है, तो वे बागी तेवर दिखा रहे हैं. जिसका इलाज अविलम्ब कांग्रेस आला कमान को करना होगा. 

 कारण जिस तरह के तेवर पिछले कुछ महीने से जी-23 नेताओं के दिख रहे हैं यह पार्टी आलाकमान की कोशिशों के बावजूद भी नियंत्रित नहीं हो रहे हैं और अब, जबकि पांच राज्यों के चुनाव की घोषणा हो गई है, उसके बाद भी इनके द्वारा पार्टी को लेकर, संगठन को लेकर और प्रकारांतर से ही सही पार्टी नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े करना, इस बात का द्योतक है कि पार्टी आलाकमान उनके द्वारा उठाये मसलों को बहुत ज्यादा दिन दबा के नहीं रख सकता. पार्टी में अन्दर ही अन्दर ज्वालामुखी सुलग रहा है और कब वह लावा बनकर फूट पड़े कहा नहीं जा सकता. शनिवार को जम्मू में वह रिसता दिख रहा है और कभी भी विकराल रूप ले सकता है.

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