भ्रष्टाचार के प्रहरी

आमजन की धारणा में पुलिस महकमा और भ्रष्टाचार एक-दूसरे का पर्याय बन चले हैं। न केवल गंभीर आपराधिक मामलों में तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने, अपराधी को बचाने के लिए साक्ष्यों को मिटाने आदि के एवज में पुलिस कर्मियों या अधिकारियों के घूस लेने की शिकायतें मिलती हैं, बल्कि बहुत सारी जगहों पर छोटे-मोटे काम के लिए भी खुलेआम उन्हें पैसा वसूलते देखा जाता है। कई आयोग और समितियां पुलिस सुधार की सिफारिश कर चुके हैं, मगर कुछ राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते, तो कुछ तकनीकी वजहों से इस दिशा में संजीदगी से कोई कदम नहीं बढ़ाया जा सका। उसका नतीजा यह है कि कई जगह पुलिस कर्मियों को अब रिश्वतखोरी जैसे शान की बात नजर आती है। नोएडा में ओखला चौकी के पुलिस कर्मियों का वसूली करते हुए वीडियो सामने आना इसकी एक बानगी है। अच्छी बात है कि ट्विटर पर इस वीडियो के प्रसारित होते ही पुलिस आयुक्त ने इस मामले को गंभीरता से लिया और चौकी प्रभारी समेत सभी पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया। हालांकि नोएडा में पुलिस का यह कोई पहला और बहुत हैरान करने वाला कारनामा नहीं है। आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को तरह-तरह से बचाने और खुद आपराधिक गतिविधियों में उसके शामिल रहने के कई मामले उजागर हैं। छिपी बात नहीं है कि रेहड़ी-पटरी पर कारोबार करने वालों, छोटे कारोबारियों, बिना पंजीकरण के कल-कारखाने आदि चलाने वालों से पुलिस नियमित वसूली तो करती ही है, परिवहन नियमों का पालन न करने वालों से भी बड़े पैमाने पर वसूली करती है। वसूली यानी गैरकानूनी तरीके से पैसे लेकर उनके गैरकानूनी कामों पर परदा डालना। यानी पुलिस खुद गैरकानूनी काम करके दूसरे के गैरकानूनी काम को वैध ठहरा देती है। मगर जबरन वसूली, हफ्ता वसूली जैसे काम कुछ आपराधिक किस्म के लोग इस आश्वासन के साथ किया करते थे कि वे उन लोगों को सुरक्षा प्रदान करेंगे, जिन्होंने पैसे दिए हैं। अब अपराधियों और गुंडों की जगह वही काम पुलिस करने लगे, तो स्वाभाविक ही उसके आचरण पर अंगुलियां उठेंगी। मगर उत्तर प्रदेश पुलिस पर शायद इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हालांकि वहां के मुख्यमंत्री अनेक मौकों पर पुलिस को सक्षम और निष्पक्ष, भ्रष्टाचार और अपराध मिटाने को तत्पर बनाने का दम भर चुके हैं, मगर सच्चाई यही है कि पुलिस की करतूतों की वजह से जितनी किरकिरी वर्तमान सरकार को झेलनी पड़ी है, शायद पहले किसी सरकार को नहीं झेलनी पड़ी।  नोएडा चूंकि औद्योगिक शहर है और माना जाता है कि ऐसे शहरों में पुलिस की कमाई के अकूत अवसर उपलब्ध होते हैं, इसलिए वहां के थानों और चौकियों में तैनाती के लिए बहुत सारे पुलिसकर्मी लालायित रहते हैं। 

यह भी छिपी बात नहीं है कि इन तैनातियों में राजनीतिक प्रभाव का भी खूब इस्तेमाल होता है। जाहिर सी बात है कि जब राजनीतिक प्रभाव से कमाई वाली जगहों पर तैनातियां होंगी, तो वहां अनियमितता की गुंजाइश भी बढ़ेगी। उत्तर प्रदेश में यह क्रम पिछली कुछ सरकारों के समय से ही चल रहा है। इसलिए नोएडा पुलिस अगर बेखौफ होकर वसूली करती देखी गई, तो इसमें हैरानी की बात नहीं। यह अलग बात है कि संबंधित चौकी के सभी कर्मियों को निलंबित कर दिया गया है, पर इससे इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगने का दावा नहीं किया जा सकता। पुलिस को जवाबदेह बनाने के लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।


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