मोदी के 'आजाद' बोल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर भावुक हो गए…... इतना कि रो पड़े, फफक-फफक कर। बाएं हाथ के अंगूठे से चश्मे के कोर तक आंसू पोंछते रहे। कई दफा पानी पिया। बोल तक नहीं पा रहे थे, रूंधते और थरथराते लफ्जों में कहानी सुनाई। फिर सैल्यूट किया। जगह थी राज्यसभा और मौका था कांग्रेस सांसद गुलाम नबी आजाद के कार्यकाल पूरा होने का। मोदी ने गुलाम नबी से अपनी दोस्ती का जिक्र किया और कश्मीर में हुई एक आतंकी घटना की कहानी सुनाई। मोदी के बाद आजाद के भी आंसू छलके। आतंकी हमले में लोगों की मौत पर बोले कि एयरपोर्ट पर बच्चे मेरे पैरों से लिपट गए, मैं चीख पड़ा- या खुदा, ये तुमने क्या किया। प्रधानमंत्री मोदी 16 मिनट बोले, इनमें से 12 मिनट गुलाम नबी आजाद पर ही बात रखी। मोदी ने कहा कि गुलाम नबी आजाद देश की फिक्र परिवार की तरह करते हैं। उनका बगीचा, कश्मीर घाटी की याद दिलाता है। व्यक्तिगत रूप से मेरा उनसे आग्रह रहेगा कि मन से मत मानो कि आप इस सदन में नहीं हो। आपके लिए मेरे द्वार हमेशा खुले रहेंगे। आपके विचार और सुझाव बहुत जरूरी हैं। अनुभव बहुत काम आता है। आपको मैं निवृत्त नहीं होने दूंगा। राज्यसभा में नरेंद्र मोदी द्वारा आजाद के बारे में कही गई एक-एक बात के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। सवाल खड़ा किया जा रहा है कि मोदी के मन में क्या है?  कहीं मोदी कश्मीर के आजाद को भाजपा की राह पर लाने की तो नहीं सोच रहे हैं, लेकिन एेसा मानने वालों की संख्या ज्यादा नहीं, फिर भी यह सवाल पूरे दम के साथ सियासी फलक पर तैर रहा है।

दरअसल गुलाम नबी आजाद कांग्रेस हाईकमान से नाराज बताए जा रहे हैं। पिछले साल अगस्त में तो एक वक्त ऐसा आ गया था, जब राहुल गांधी ने उन पर भाजपा से साठगांठ तक का आरोप लगा दिया था। राहुल ने उस समय कहा था, ‘पार्टी के कुछ लोग भाजपा की मदद कर रहे हैं।’ इस पर आजाद ने इस्तीफे की पेशकश तक कर डाली थी। आजाद ने कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन और संगठन चुनाव को लेकर सोनिया गांधी को चिट्‌ठी लिखी थी। जिस पर काफी बवाल मचा था। वह बवाल अभी थमा नहीं है। यह वही गुलाम नबी आजाद हैं, जिन्होंने कांग्रेस को आईना दिखाते हुए कहा था कि अगर पार्टी में चुनाव नहीं हुए तो 50 साल तक हम विपक्ष में बैठेंगे। आजाद ने पिछले साल 29 अगस्त को कहा था कि जो लोग पार्टी में चुनाव का विरोध कर रहे, वे अपना पद जाने से डर रहे हैं। कई दशकों से पार्टी में चुनी हुई इकाइयां नहीं हैं। हमें 10-15 साल पहले ही ऐसा कर लेना था। पार्टी यदि अगले 50 साल तक विपक्ष में बैठना चाहती है, तो पार्टी के अंदर चुनावों की जरूरत नहीं है। पिछले साल नवंबर में आजाद ने बिहार चुनाव के नतीजों को लेकर पार्टी पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि चुनाव फाइव स्टार कल्चर से नहीं जीते जाते। हम बिहार और उप चुनावों के नतीजों से चिंतित हैं। 

वर्षों तक पूरी वफादारी के साथ देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस से जुड़े रहे गुलाम नबी आजाद के बारे में मोदी द्वारा कहे गए एक-एक शब्द काफी मायने रखते हैं। मोदी की बातें कांग्रेस को बेचैन करने के लिए काफी हैं। लेकिन अगर इसको दूसरे संदर्भ में देखें तो यह मोदी का आजाद को खुश करने का प्रयास हो सकता है, लेकिन आजाद उम्र के इस पड़ाव पर अब पाला नहीं बदलेंगे। हां, मोदी का मकसद हो सकता है कि वे कांग्रेस के अंदर संदेह पैदा कर दें, क्योंकि आजाद कुछ समय से पार्टी में साइड लाइन हैं। कांग्रेस के अंदर खटपट भी जारी है। राहुल कामयाब होते तो ये लोग पहले ही किनारे हो गए होते। मोदी के बोल आजाद के व्यवहार की जीत कही जा सकती है। इतना तो सभी मानते हैं कि आजाद कांग्रेस छोड़कर कभी कहीं नहीं जाएंगे। जब आजाद को दिल्ली से काटने के चक्कर में जम्मू-कश्मीर का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भेजा गया था, तब संयोग से ही सही, वे वहां मुख्यमंत्री बन गए। मोदी ने आजाद पर जो चारा फेंका है, वो दरअसल राज्यसभा में कांग्रेस का साथ लेने के लिए दिखाई देता है।

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