मुश्किलें और जरूरत

संसद में केंद्रीय बजट के जरिए अर्थव्यवस्था को बल देने की जो कोशिशें हुई हैं, उनका जमीनी असर न केवल योजनाओं और बजट के क्रियान्वयन, बल्कि सरकार के भावी निर्णयों पर निर्भर करेगा। जो प्रयास मूलभूत ढांचे में निवेश या उद्योग जगत को प्रोत्साहित करने के लिए किए गए हैं, उनसे हम उम्मीद कर सकते हैं। बजट से भी जाहिर है, सरकार लोगों को मिल रही प्रत्यक्ष आर्थिक मदद के अभी तक के प्रयासों से संतुष्ट है और इसका बखान बजट में बखूबी हुआ है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट में आत्मनिर्भर भारत पर जोर दिया है, तो कोई आश्चर्य नहीं। कोविड-19 महामारी का मुकाबला करने के लिए सरकार के 27.1 लाख करोड़ रुपये के आत्मनिर्भर भारत पैकेज से संरचनात्मक सुधारों को बढ़ावा मिला है। अब आम बजट में सरकार ने 64,180 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ आत्मनिर्भर स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू करने का प्रस्ताव रखा है। स्वास्थ्य ढांचा मजबूत करना कितना जरूरी है, यह हमने कोरोना के समय अच्छी तरह समझ लिया है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन भी जारी रहेगा। 

बहरहाल, जब सरकारी खजाना दबाव में है, तब आयकरदाताओं को वैसे भी राहत की ज्यादा उम्मीद नहीं थी। सरकार ने 75 साल या उससे अधिक उम्र के पेंशनभोगियों को कुछ राहत दी है। 135 करोड़ लोगों के देश में करीब छह करोड़ लोग आयकर रिटर्न दाखिल करते हैं, जबकि करीब तीन करोड़ लोग ही आयकर चुकाते हैं। मुश्किल समय में सरकार आयकर का दायरा बढ़ाने के लिए कुछ कर सकती थी। यह आयकर बढ़ाने का समय नहीं है, यह अन्य करों को बढ़ाने का भी समय नहीं है। ऐसे में, सरकार ने पेट्रोल पर 2.5 रुपये प्रति लीटर का अधिभार लगाया है, जबकि डीजल पर 4 रुपये। इससे पेट्रोल, डीजल की कीमतों को तीन अंकों में जाने और बने रहने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा, मतलब महंगाई बढ़ेगी। मोबाइल उपकरण पर कस्टम ड्यूटी बढ़ेगी, लेकिन इसका लाभ तभी है, जब देशी कंपनियां स्वयं पर्याप्त उपकरण बनाने लगें, वरना आज के समय में मोबाइल फोन को महंगा करने की दिशा में कोई भी निर्णय अनुकूल नहीं है। जब भारत को निर्यात बढ़ाने के लिए ज्यादा प्रयत्न करने हैं, तब आयात बढ़ाने के छोटे-मोटे उपाय भले किसी निजी कंपनी या उपभोक्ता के लिए फायदेमंद हों, लेकिन हमें व्यापकता में देश की आत्मनिर्भरता बढ़ाने के बारे में ज्यादा सोचना चाहिए। सस्ते घर की सुविधा, डूबते कर्ज का प्रबंधन, सरकारी बैंकों को पूंजी देने का प्रस्ताव, उज्ज्वला योजना का विस्तार, रेल व बस सेवा विस्तार, किसानों को फसल लागत से डेढ़ गुना मूल्य देने का इरादा इत्यादि अनेक प्रशंसनीय कोशिशें हैं। हम समझ सकते हैं, विनिवेश से भी सरकार पैसे जुटाना चाहती है, यह पुराना एजेंडा है। पिछले बजट में 2.1 लाख करोड़ रुपये विनिवेश से जुटाने का अनुमान था और इस बार 1.75 लाख करोड़ रुपये जुटाने का इरादा है, लेकिन यह एक ऐसा मोर्चा है, जहां सरकार को राजनीति और अनेक अड़चनों का सामना करना पड़ेगा। ग्रामीण विकास, रोजगार और सामाजिक क्षेत्र में सरकार के खर्च का बढ़ना तय है, अत: सरकार को इस दौर में वित्तीय घाटे की चिंता ज्यादा नहीं करनी चाहिए। यह ज्यादा व सुनियोजित खर्च के साथ अर्थव्यवस्था में मांग और विकास की गति बढ़ाने का समय है।


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