जब मार पड़ी शमशेरों पर...

अभी कुछ दिन पहले तक सीधी बात भी उलटी समझने वाले हमारे चिर अशुभ चिंतक पड़ोसी जिसमे से एक को हम आतंकिस्तान और दूसरे को भूपिपासु के नाम से जानते हैं, जब यह समझ गए कि अब भारत प्रत्यक्ष या परोक्ष हिमाकतों का मुंह तोड़ जबाब देने के लिए दृढ़ संकल्पित है, तो अब इस कहावत को चरितार्थ करने लगे हैं कि ‘जब मार पड़ी शमशेरों पर तो महाराज मैं माऊं हूं.’ यह एक दिन में नहीं हुआ, दशकों से पाक आतंक का निर्यात कर हमें परेशान किये हुए है. पूरे देश में उस के हैवान घूम-घूम कर निर्दोषों को लहूलुहान करते रहे और उस दौर की कांग्रेस सरकार या अन्य सरकारें उन्हें चेतावनी देकर और उनमें सदबु​िद्ध का प्रकाश उदित होने का इंतजार करती रही, लेकिन वह सदबु​िद्ध नहीं उदित हुई. अलबत्ता उनके काले कारनामे और जघन्य होते गये और उन्होंने घाटी में आतंक का खुला खेल खेला और अलगावादियों की एक जमात खड़ी की. कई दशक तक उस क्षेत्र को अशांत बनाये रखे और अब जबकि चुन चुन कर आतंकी जहन्नुम रसीद किये जा रहे हैं कहीं ना कहीं से इक्का-दुक्का प्रकट ही हो रहे हैं, जिन्हें भी हमारी सुरक्षा एजेंसियां उनके नियत स्थान यानी जेल या जहन्नुम पहुंचा रही हैं. पाक के भाड़े के हैवानों ने देश के अन्य भागों में भी माहाैल खराब करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. वैसा ही हाल चीन का भी था. उसे कब हमारे सीमावर्ती इलाके में उसकी जमीन होने दौड़ा पड़ जाय और वह घुसपैठ की कोशिश करे कहा नहीं जा सकता था. दोनों ने मिलकर सीमाओं पर, अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हमें घेरने का हमें छकाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा और अभी कुछ महीनों तक यह बदस्तूर खुलेआम जारी था. कारण दो बदनीयत लोग साथ रहें इसके सिवा उनके पास कोई चारा नहीं था. कारण जैसे-जैसे दुनिया को आतंकिस्तान के ही आतंक का मक्का होने की असलियत का एहसास हुआ और दूसरों की जमीन हड़पने के लिए किसी भी स्तर तक गुजरने की चीन की मानसिकता का दिग्दर्शन होने लगा उसने इन्हें घास डालना बंद कर दिया. मोदी युग में हमने भी इनसे डील करने के तौर-तरीकों में व्यापक बदलाव किया। सुरक्षात्मक खेलना बंद कर इनकी हर गलत हरकत का आक्रामक और जबर्दश्त जबाब देना शुरू किया और उतने ही आक्रामक कूटनीतिक चालों से इनकी कलई दुनिया के समाने खोलना शुरू किया. इस तरह की जबर्दश्त सामरिक और कूटनीतिक घेराबंदी से इन्हें एहसास करा दिया कि अब तक आप बहुत खेल खेल चुके, लेकिन अब इस बार हमने ठान लिया है कि आपका कोई गलत दांव हम सफल नहीं होने देंगे. चीन और पाकिस्तान दोनों को यह एहसास है कि आज का भारत दोनों से साथ निपटने में पूरी तरह सक्षम है और दुनिया भी उसके साथ है. परिणामतः चीन ने अपनी अकड़ को तिलांज​िल दी और पीछे हटाने को बाध्य हुआ. जब चीन नहीं टिक सका तो फिर पाक की क्या बिसात है उसे तो पीछे जाना ही था. कारण दोनों से एक साथ गीदड़ भभकी देकर देख लिया कि उससे हमारी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा, उलटा हमारी सामरिक और कूटनीतिक आक्रामकता और तैयारी में अभूतपूर्व तेजी आ गयी, जिसने इन दोनों को अचकचा कर रख दिया, तो आज दोनों सदबु​​िद्ध का परिचय देते नजर आ रहे हैं. इन पर कितना विश्वास करना है यह देश और देश की सरकार और उसके मुखिया अच्छी तरह जानते हैं. कारण इन दोनों का अतीत हमेशा दोस्त बन कर पीठ में छुरा भोंकने का रहा है, गद्दारी का रहा है. डोकलाम के सबक के बाद भी चीन ने लद्दाख में हिमाकत की और उसका साथ देने के लिए पाक ने एक के बाद एक सीज फायर उल्लंघनों की झड़ी लगा दी. अभी भी चीन सिक्किम और अरुणाचल सीमा पर अपने बुनियादी ढांचे को मजबूत कर रहा है. ये दोनों देश स्वाभावतः गिरगिट हैं. यह कब रंग बदल दें कहा नहीं जा सकता. आज ये सही राग इसलिए अलाप रहे हैं कारण इन्हें पता है कि हम इन दोनों को साथ ठीक करने में सक्षम हैं तो हमें अपनी सामरिक, कूटनीतिक और आर्थिक सशक्तता को सतत बढाते रहना है और प्रधानमंत्री के आत्म निर्भर भारत अभियान को उसके इच्छित मुकाम तक पहुंचाना है. जब हम मजबूत रहेंगे तो वह चाहे भूमिपासू और दुनिया का दादा बनने का आकांक्षी चीन हो या आतंकिस्तान सब माऊं बने रहेंगे नहीं तो फिर कोई ना कोई खुराफात करेगे. इसलिए प्रधानमंत्री मोदी का जो हर तरह से प्रगत और सशक्त भारत बनाने का अभियान है उसे हर तरह से पूरा करना है और चीन और पाक जैसे दुश्मनों को अपनी औकात में रखना है.


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