बवंडर में फंसी ममता

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी में टूट-फूट का जो भूचाल आया हुआ है वह थमने का नाम नहीं ले रहा है। शायद ही कोई दिन ऐसा जा रहा है जब कोई छोटा-बड़ा नेता पार्टी छोड़ कर ना जा रहा हो. इसमें कोई दो राय नहीं कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में एक नए भारत के निर्माण की शुरुआत हुई है, जिस तरह वह चाहे विकास का फ्रंट हो, कोरोना जैसी महामारी से मुकाबला हो, सीमा पर देश के दुश्मनों के छक्के छुड़ाने की बात हो, आर्थिक सुधारों की बात हो या दशकों से लंबित मामलों का समाधान करने के लिये साहसी निर्णय की दरकार हो. सर्वत्र भारतीय जनता पार्टी की प्रधानमंत्री मोदी नीत सरकार ने एक कीर्तिमान बनाया है, नया इतिहास रचा है. जिसके चलते पूरे देश के जनमानस में भाजपा को लेकर एक नया जोश, एक नया विश्वास जगा है और इन सबके चलते पूरे देश में उसका परचम लगातार तेज गति से लहरा रहा है और देश के जिन क्षेत्रों में उसकी उपस्थिति 2014 के पहले नगण्य थी आज वहां भी उसकी समर्थकों की संख्या में दिन दूना रात चौगुना इजाफा हो रहा है. 

यही सूरतेहाल पश्चिम बंगाल का भी है. भाजपा को वहां व्यापक जन समर्थन मिल रहा है. इससे उसके कार्यकर्ताओं में जोश उफान मार रहा है. वर्षों तक वाम दलों के कुशासन का केंद्र रहा बंगाल ने बड़ी आशा से ममता बनर्जी को मौका दिया था. उनकी दूसरी पारी समाप्ति की और है, लेकिन आज उनके शासन की तुलना वामदलों के शासन से ही हो रही है. सारांश यह कि 10 साल के शासन में वह ऐसा कुछ नहीं कर सकी जो वामदलों से अलग है. उन पर भी वहीं सब नकारात्मक आरोप लग रहे हैं जो वामदलों पर लगते थे. जैसे-जैसे भाजपा का जन समर्थन बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे उसका प्रचार भी तेज गति से हो रहा है आज वहां हालत यह है कि एक तरफ भाजपा दिख रही है और दूसरी ओर कांग्रेस, वामदल, एमआईएम और टीएमसी आदि दल एक हैं और एक ही मत बैंक को लेकर ताल ठोंक रहे हैं. यही नहीं ममता के गत लगभग एक दशक के शासन काल में ऐसा कुछ नहीं किया गया, जिसकी गूंज देशव्यापी हो और उनके द्वारा पार्टी नेताओं की तुलना में अपने परिवार को ज्यादा तरजीह देने से उनके पार्टी के प्रमुख नेताओं में काफी आक्रोश था. जब तक उनके सामने कोई विकल्प नहीं था तब तक वह दीदी के साथ बने रहें, लेकिन जैसे ही भाजपा के रूप में एक सशक्त विकल्प उन्हें दिखा उनमें भगदड़ शुरू हो गयी है जो इक्का-दुक्का से शुरू होकर अब बगावत के बवंडर में तब्दील होती नजर आ रही है. 

कारण आज उनके नेताओं को पार्टी में अपना भविष्य नहीं दिख रहा है, कारण एक ओर दीदी का परिवारवाद और तथाकथित सेक्युलर मतों में विभाजन का ख़तरा उनकी राजनीतिक नाव डुबो सकता है और दीदी के साथ रहे तो पहले क्रमांक पर परिवार ही रहेगा तो इस माहौल में उन्हें सबसे सुरक्षित भाजपा ही नजर आ रही है. ममता अपनी अकड़ और बंगाल की नब्ज उनके पास है इस दंभ में पार्टी का सही हाल क्या है यह जान ही नहीं पायीं और अब जब उन्हें भान हो रहा है तो भी गलती पर गलती करती जा रही हैं. उनका राम नाम के जयकारे को लेकर आपत्ति करना उनकी मनोदशा का सही विश्लेषण करता है, लेकिन अब चुनाव सर पर है. वे कुछ भी बोलकर, अपने आक्रामक तेवर का प्रदर्शन कर अपने आपको मजबूत दिखाने का प्रयास कर रही हैं, लेकिन सच यह है कि वह एक ऐसे राजनीतिक बवंडर में फंस चुकी हैं, जिससे बाहर निकलना उनके लिए आज यदि असंभव नहीं तो काफी मुश्किल जरूर नजर आता है. ममता ने समय रहते अपने पार्टी के अंदर ही अंदर उमड़-घुमड़ रहे ज्वालामुखी की ओर ध्यान नहीं दिया. अब वह लावा बनकर फूट-फूट कर बाहर आने लगा है. साथ ही चुनाव की दुंदुभी भी बजनी शुरू हो गई है. इस माहोल में उन्हें विरोध का यह लावा रोकना बहुत कठिन दिखता है. 


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