LAC पर राहुल ने लांघी सीमा


नई दिल्ली 

कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की ओर से चीन को लेकर सरकार पर लगाए गए आरोपों का करारा जवाब भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने दिया है। उन्होंने इसे कांग्रेस का सर्कस बताते हुए राहुल गांधी पर सेना का अपमान करने का आरोप लगाया। साथ ही पूछा कि क्या यह कांग्रेस और चीन के बीच हुए समझौते का हिस्सा है? उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी को कभी सेना पर भरोसा नहीं रहा है।

राहुल गांधी ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि सरकार ने लद्दाख में चीन के सामने घुटने टेक दिए और जमीन का एक टुकड़ा चीन को सौंप दिया। इसके जवाब में नड्डा ने एक के बाद एक कई ट्वीट किए । भाजपा अध्यक्ष ने कहा, ''राहुल गांधी की वजह से आज कांग्रेस का एक नया संस्करण। वह क्यों झूठे दावे कर रहे हैं कि डिसइंगेजमेंट भारत के लिए हार है? क्या यह कांग्रेस-चीन के बीच एमओयू का हिस्सा है? सशस्त्र बलों की अगुआई में चल रहे डिसइंगेजमेंट के बीच क्या यह हमारे बहादुर जवानों का अपमान नहीं है? 

नड्डा ने एक अन्य ट्वीट में कहा, ''कांग्रेस का रिकॉर्ड बताता है कि इसने सशस्त्र बलों पर भरोसा नहीं किया। यह लोगों को पता है कि यूपीए ने कभी सेना पर भरोसा नहीं किया और उनके हाथ बंधे हुए थे, जैसे 2008 में मुंबई हमले के बाद।'' 

भाजपा अध्यक्ष ने 1962 युद्ध को लेकर एक टीवी रिपोर्ट को शेयर करते हुए लिखा, ''मौजूदा डिसइंगेजमेंट प्रक्रिया के तहत सरकार ने कोई भारतीय भूमि नहीं दी है। यदि किसी ने हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन देने का पाप किया तो वह यह भ्रष्ट, कायर वंश है, जिसने अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए देश को तोड़ दिया।''

राहुल गांधी ने शुक्रवार को पूर्वी लद्दाख में सैनिकों को पीछे ले जाने को लेकर चीन से हुए समझौते को लेकर सरकार पर सवाल उठाया था और आरोप लगाया था कि मोदी ने भारतीय इलाके को चीनियों को दे दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री पड़ोसी देश के सामने झुक गए हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बृहस्पतिवार को संसद के दोनों सदनों को बताया था कि चीन के साथ पैंगोंग झील के उत्तर एवं दक्षिण किनारों पर सेनाओं के पीछे हटने का समझौता हो गया है और भारत ने इस बातचीत में कुछ भी खोया नहीं है जिसके बाद राहुल का यह बयान आया। 

क्या है कांग्रेस-चीन के बीच समझौता?

गौरतलब है कि कथित तौर पर कांग्रेस पार्टी और चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के बीच बीजिंग में 7 अगस्त 2008 को एक समझौते पर हस्ताक्षर किया गया था। पिछले साल इसकी जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट जाने की सलाह दी थी। हालांकि, इस पर पीठ ने टिप्पणी की, ''हम पाते हैं कि इसमें ऐसा कुछ लगता है, जिसके बारे में सुना नहीं और जो न्याय विरूद्ध है। आप कह रहे हैं कि चीन ने एक राजनीतिक दल के साथ समझौता किया है सरकार से नहीं। एक राजनीतिक दल चीन के साथ कैसे समझौता कर सकता है?''


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