यह आलोचना नहीं बहक जाना है

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा दिया गया ताजातरीन वक्तव्य कि सद्दाम हुसेन और गद्दाफी भी चुनाव जीतते थे. देश के लोकतंत्र पर एक ऐसा हमला है, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार करना असंभव है. स्वाभाविक है इस पर ऐसी ही तीखी प्रतिक्रया सत्ताधारी खेमे से भी आयी है, जिसमें कहा गया है कि वैसे हाल देश में सिर्फ आपातकाल के समय था. आलोचना करने के बहुत से तरीके हैं, लेकिन जो तरीका राहुल गांधी ने चुना उसे कदापि सही नहीं ठहराया जा सकता. हमारे देश में वैसा कभी नहीं हो सकता. आपातकाल लगाने के बाद उसका खामियाजा इंदिरा गांधी जैसे नेता को भी भोगना पड़ा था, जिनके बारे में यह नारा दिया जाता था कि ‘इंदिरा भारत है और भारत इंदिरा है’ उन्हें भी आपातकाल लागाने की कीमत सत्ता गंवा कर चुकानी पड़ी थी और वह अपना स्वयं का चुनाव भी हार गयी थीं. ऐसे में कोई नेता ऐसा कुछ करने की सोच सकता है ऐसा नहीं लगता. सत्तापक्ष और विपक्ष में तीखी बहस और आरोप-प्रत्यारोप होते रहते हैं, होनी भी चाहिए. यह स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है, उसके लिए आवश्यक है. स्वस्थ आलोचना से काम नहीं चल रहा है और प्रतिस्पर्धी लगातार आगे ही बढ़ता जा रहा तो कुछ भी बोलने लगे और आपकी आलोचना नकारात्मक स्वरुप अख्तियार कर ले तो वह आलोचना, अालोचना नहीं रह जाती, वह अपनी सकारात्मकता खो देती है. यह सद्दाम के दौर में इराक की या गद्दाफी की दौर में लीबिया की स्थिति के बार में उनकी अनभिज्ञता को भी दर्शाता है. हममें और उनमें कोई तुलना हो ही नहीं सकती. 

राहुल गांधी को यह पता होना चाहिए कि कुछ भी बोल जाने से, भड़काने वाले या बहके व्यक्ति जैसे बयानों से कांग्रेस का भला नहीं होने वाला है. उसके लिए बार- बार की पिटाई से दिग्भ्रमित हो चुकी पार्टी और हताश कार्यकर्ताओं में नयी ऊर्जा का संचार करने की जरूरत और जो पार्टी की 2014 से अब तक की स्थिति का मूल्यांकन करने की मांग करती है जो तदनुसार सुधारात्मक कदम और संगठनात्मक पुनर्गठन से होगा. सिर्फ और सिर्फ उल्टे-सीधे बयान से कुछ नहीं होने वाला, उससे सिर्फ और सिर्फ उनकी पार्टी का नुकसान होता है जो हो रहा है. साथ ही उनकी छवि पर भी बट्टा लगाने का काम हो रहा है. पार्टी में आया राम गया राम का सिलसिला जारी है. पार्टी के जी -23 के नेता अभी भी बगावती तेवर अपनाए हुए हैं, रोज पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाने की मांग पार्टी में उठ रही है. कई राज्यों से उन्हें पुन: अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने की मांग उठ रही है, प्रस्ताव पारित हो रहे हैं, पार्टी के अनुसांगिक संगठन भी ऐसी मांग कर रहे हैं. कांग्रेस का देश में विकल्प बनने के लिए और तीसरी शक्ति की स्थापना करने के लिए पुराने दिग्गज शरद पवार जैसे नेता हलचल शुरू कर चुके हैं. ऐसे में उनसे इस तरह आचार, व्यवहार और बयानबाजी करने की उम्मीद है, जो देश की उदात्त लोकतान्त्रिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुरूप हो. आज पुरी दुनिया हमारे लोकतंत्र का आदर करती है. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होना हमारी शान है. ऐसे में देश की एक सबसे पुरानी और देशव्यापी पार्टी का नेता अपने देश के लोकतंत्र की तुलना सद्दाम हुसेन कालीन इराक या गद्दाफी कालीन लीबिया से करें तो यह उसके लिए शोभनीय नहीं है. उन्हें कम से कम कुछ बोलने के पहले कांग्रेस पार्टी के इतिहास और और अपनी विरासत दोनों पर गौर करना चाहिए. वे जो भी कहते हैं, उसकी गूंज देश में ही नहीं दुनिया में भी होती है. हो सकता है कि कई चीजें देश में एेसी हो रही हैं जो उन्हें नापसंद हों उसका विरोध करना, उसकी अालोचना करना, उस पर टीका टिप्पणी करना उनका अधिकार है, लेकिन उसमें द्वेष का कोई स्थान नहीं है. साथ ही सार्वजनिक जीवन की शुचिता का, शालीनता का परित्याग करने का कोई कारण नहीं है, यदि ऐसा होता है तो इससे उन्हें या उनकी पार्टी को कोई फायदा मिलेगा, ऐसा नहीं लगता. कांग्रेस ने लम्बे समय तक सत्ता का सुख भोगा है, अब उस स्थान पर कोई और है, इसलिए आप बेचैन हो जाएं और कुछ भी बोलने लगे तो यह ठीक नहीं है.

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