यह क्या हो रहा है

उतर प्रदेश के बहराइच जिले में एक अध्यापक द्वारा इसलिए आत्महत्या करना कि उसके चार दबंग सहकर्मी जो उसी भवन में रहते थे, जिसमें अध्यापक सपरिवार रहता था और उसके पड़ोसी थे, सतत उसकी पत्नी से छेड़छाड़ करते थे, जिसे अध्यापक बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली. यह घटना जितनी दुखद है उतनी ही आश्चर्य जनक भी िक कोई उनकी सहायता के लिए क्यों नहीं सामने आया या उन्होंने कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार एजेंसियों की मदद क्यों नहीं ली. जब हमारे समाज में एक पढ़ा लिखा आदमी जो की एक शिक्षक भी है, इस तरह निराशा और हताशा के गर्त में चला जाता है कि उसे उसके सामने मरने के सिवाय कोई विकल्प ही नहीं नजर आता तो यह हमारे समाज के मुंह पर एक ऐसा तमाचा है जिसकी गूंज बहुत दूर-दूर तक होनी चाहिए और समाज को अपने इस तरह के पतन के बारे में गंभीरता पूर्वक विचार कर कुछ ऐसा बंदोबस्त करने के बारे में सोचना चाहिए, जिससे कुत्सित मानसिकता के विशकार लोग अपनी काली करतूतों से समाज को कलंकित ना करें और किसी व्यक्ति को आत्महत्या जैसा जघन्य पातक करने के लिए बाध्य ना करें. हमारे समाज में कुछ ऐसी वारदातें सतत महिलाओं और बालिकाओं के सन्दर्भ में हमारे देश के कोने-कोने से जिस तरह सामने आ रही हैं, परिवार और उसका जीवन तबाह कर रही हैं, यह किसी भी समाज के लिए शोभनीय नहीं है और इससे उस पर  ऐसा बदनुमा दाग लगता है जिसकी सफाई असंभव है.  

अब सब हरकत में हैं और कुकर्मी पलायन पर हैं, अब उनकी गिरफ्तारी भी होगी और उन्हें अपने कुकर्म के लिए जबाबदार भी ठहराया जाएगा, लेकिन वे जिस परिवार के वे मुखिया थे वह तबाह हो गया. प्रशासन को चाहिए कि वह इस मामले की तह तक जाए और यह पता लगाए कि आत्महत्या की नौबत आने तक ऐसा कुछ क्यों नहीं किया गया कि वह नौबत ही नहीं आती. साथ ही समाज को अपने स्तर पर भी और चौकस रहने  की जरूरत है, आखिर जब ऐसा हो रहा था तो किसी ने उनकी सहायता क्यों नहीं की और दबंगों की आपत्तिजनक हरकतों पर विराम लगाने की कोशिश क्यों नहीं की गयी. शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता है जब महिलाओं, बालिकाओं को लेकर कोई ना कोई लोम हर्षक और कुत्सित वारदात हमारे सामने नहीं आ जाती.  इसमें कोई भेदभाव नहीं है. यह पूरे देश में और इसके कोने-कोने में हो रहा है. इसके लिए सख्त कानून है, त्वरित गति से मामलों का निपटारा कर सजा भी दी जा रही है. इसके बाद भी ऐसे मामलों को सतत सामने आना और इतने विद्रूप रूप से सामने आना जैसे कि कुकर्मियों में दीन-ईमान का डर नहीं है. वे मानवीय संवेदनाओं से शून्य है. आज के हालात काफी डरावनी तस्वीर हमारे समाने प्रस्तुत करते हैं. इससे साफ है कि इससे सिर्फ कानूनी तौर तरीकों से पार नहीं पाया जा सकता. समाज को भी आगे आना होगा और अपनी सक्रिय भागीदारी निभानी होगी. कारण कहीं ना कहीं यह संस्कार का मामला है. हमारा समाज अपने लड़कों में यह भाव नहीं जगा पा रहा है कि महिलाओं का सम्मान कैसे किया जाना चाहिए. अभी भी हमारे समाज के एक बड़े हिस्से में महिलाओं को लेकर दृष्टिकोण सही नहीं है, जिसके लिए हर व्यक्ति को सक्रिय होना होगा, अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी तब माहौल सुधरेगा और शुरुआत हर घर से करनी होगी. हम ठीक हैं तो बाकी सब ठीक हैं यह मान्यता जब तक रहेगी तब तक कुछ नहीं होगा. हमें यह सोचना होगा कि ऐसा क्यों हो रहा है और क्या हो रहा है तो इसका सुधार कैसे होगा तभी तो बात बनेगी. सिर्फ मूक दर्शक बनकर हम अपना और अपने समाज का नाम खराब कर रहे हैं, जो नहीं होना चाहिए.


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