इमरान की उल्टी गिनती

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की पहचान एक हरफनमौला क्रिकेट खिलाड़ी की थी. अपने उस दौर में उन्होंने दुनिया देखी थी. अपने राजनीतिक कैरियर के पहले जब उन्होंने दुनिया देखी थी, उस दौरान और अपने राजनीतिक कैरियर के उषाकाल में इस तरह के विधान कर रहे थे, जिससे यह उम्मीद जगी थी कि वह उन नादानियों से पाक को उबारने के लिए कुछ करेंगे जो उसे रसातल में पहुंचा रही है. परन्तु वह वैसा कुछ कर नहीं पाएं, बल्कि उन कमियों और नादानियों को और बढ़ाने का काम उनके नेतृत्व में पाकिस्तान में हुआ और अब उनकी उल्टी गिनती शुरू हो गयी है. आज पाकिस्तान के जो सूरते हाल है, उसे उसके इतिहास का सबसे खराब काल कहा जा सकता है. देश दिवालिया होने की कगार पर है, एफएटीएफ की तलवार सर पर लटकी है, दुनिया में उसकी पहचान आतंक के मक्का की है, इसके चलते वह दुनिया के लिए अछूत है, उसके चीन, मलेशिया जैसे दोस्त अपने कदमों से उसकी हालत और पतली कर रहे हैं. यह सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि इमरान से सबसे बड़ी गलती जिसकी गूंज पूरी दुनिया में हुई. वह सत्ता के लिए उनका बेसब्रापन, इसके लिए उन्हें वहां के असली निजाम यानी सेना का कृपा पात्र बनना पड़ा और उसकी नीतियों पर या उन्ही तौर-तरीकों से अपनी सरकार चलानी पड़ी. जैसा सेना चाहती थी, उन्होंने हमारे साथ वही कुत्सित हथकंडे अपनाए जो उनके पूर्ववर्ती शासक अपनाते रहे हैं और उसका प्रतिकार भी उन्होंने अच्छी तरह भोगा और आज पकिस्तानी निजाम हमसे शांति पाठ करने को मजबूर है. एक उदारवृत्ति दिखाने वाला व्यक्ति इस तरह कठमुल्ला बन गया. उसकी पत्नी एक ऐसी महिला है, जिसके बार में यह कहा जाता है की वह जिन्नों से बात करती है, यह एक ऐसी मिसाल है जो अपने आप में किसी शोकांतिका से कम नहीं है. इन सबके चलते वह पाक के लिए, उसकी रियाया के लिए कुछ नहीं पर पाए और उसे और रसातल में ठेल देने का पातक अलग से उनके सर पर लग गया. 

किसी राष्ट्र की इससे बड़ी शोकांतिका क्या हो सकती है की वह कोरोना जैसी महामारी का भी जैसे चाहिए वैसा मुकाबला करने में सक्षम नहीं है. एक प्रधानमंत्री का खुल कर यह कबूल करना कि उसके सरजमीं पर एक बहुत बड़ी तादाद में आतंकी संगठन सक्रिय है यह जताता है की वह कितना बेबस है. इससे स्पष्ट है की उनका नैतिक कलेवर अपने पूर्ववर्ती पाकिस्तानी शासकों से भी गया बीता है. जिस तरह पाक को चीन का उपग्रह जैसा बना दिया, ऐसी उम्मीद उनसे उन्हें जानने वालों ने नहीं की होगी. हो सकता है कि वह किसी तरह शनिवार को होने वाला उनकी सरकार का विश्वास मत जीत जाएं, परन्तु इसकी नौबत आने तक उनकी छवि का जो ह्रास हुआ है, जो दुर्गति उनके कार्यकाल में पाकिस्तान की दुनिया भर में हो चुकी है और हो रही है, जो उनका नैतिक कलेवर दुनिया भर में तारतार हुआ है, क्या वह उसकी भरपाई कर पायेंगे? ऐसा नहीं लगता है किसी के कृपा से हासिल कोई चीज तब तक ही रहती है जब तक कृपा करने वाल कृपालू है. एक बार उसकी भ्रकुटी तनी कि सब कुछ मटियामेट होना तय है. लगता है उनकी कृपालू पाक की सेना की भ्रकुटी उनके ऊपर तन गयी है और उनकी उल्टी गिनती शुरू हो गयी है. अब यह देखना है की वह सत्ता में कितने दिनों रह सकते हैं? अपने जन्म से ही पाकिस्तान शासकों के मामले में अभिशप्त रहा है, जिनके हमारे प्रति द्वेष और उनकी स्वार्थ लिप्सा ने पाकिस्तान को कभी जिम्मेदार देश बनने ही नहीं दिया. देखना यह है कि आगे कब तक वह ऐसी दशा झेलता है, यह बीच में ही अपना अस्तित्व खो देता है. आज अपने नेताओं के कुकर्मों और कुनीतियों से पाकिस्तान एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां आराजकता का, अत्याचार का राज हो गया प्रतीत होता है. पिसती जनता को कोई सहारा देने के बजाय, उसे राहत पहुंचाने के बजाय, सही को सही और गलत को गलत कहने के बजाय इमरान ने सत्ता से िचपके रहना ज्यादा महत्वपूर्ण समझा और वही उनकी निरंतर हो रही दुर्दशा का कारक है। 

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