सब कुछ गवां के होश में आये...

कांग्रेस में जी-23 नेताओं का आक्रोश उफान पर है. यह अलग बात है कि उनमे से अधिकांश नेताओं का इतना बड़ा कद मेहनत कम आला कमान की कृपा से ज्यादा हुआ है और जैसा उनके विरोधी कांग्रेस जन कह भी रहे है. उनमें अधिकांश या तो चुनाव में खेत रहे है या राज्यसभा के सदस्य है तो जिनकी पार्टी में अब तक की प्रगति में कांग्रेस आला कमान का निर्णायक वरद हस्त और भक्ति की भूमिका प्रमुख रही है  वह अचानक क्यों प्राकरांतर से ही सही उसके खिलाफ मुखर हो गए है? इस पर कांग्रेस आला कमान को सोचना होगा. इसमें जो पहला कारण लगता है वह कांग्रेस पार्टी का निरंतर क्षरण है .पार्टी २०१४ से लगातर  अपना जनाधर  खोती जा रही है बीच में उसने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़  में सत्ता हासिल की लेकिन उसके कुप्रबंधन ने मध्यप्रदेश की बलि ले ली और राजस्थान में कैसे सूरते हाल है यह सर्वविदित है. उसके बाद पार्टी कोई  बड़ी विजय नहीं हासिल कर पाई है. गुजरात, बिहार और उत्तर प्रदेश में उसे सत्ता से दूर  हुए लगभग  तीन दशक से ज्यादा समय  बीत  है च्‍ाुका है. इन राज्यों  में सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी प्रयत्नों की पराकाष्ठा कर चुके है और कर रहे  हैं लेकिन परिणाम  बेहद निराशा जनक  है. उपरोक्त कारणों से संकेत साफ़ है कि अब एक  जमाने  में  कांग्रेस आला कमान का यशोगान कर ना थकने वाले ये नेता अब उसमे वह करिश्मा या काबलियत नहीं देख रहे  हैं जिसने दशकों इन्हें सता सुन्दरी  का  आनंद उठवाया.  स्वाभाविक है कि अब इनमे बेचैनी है. जिसका जबाब  आला कमान को ढूँढना  होगा. हो  सकता है  कि  जी -२३ नेताओं के बात रखने का तौर तरीका आला कमान के अब तक के अनुभव के मुताबिक ना हो. परन्तु इससे  उनके द्वारा उठाये जा रहे मुद्दों की अहमियत कम नहीं हो जाती. कांग्रेस को यदि ज़िंदा रहना है तो उसे देश भर में अपना सांगठनिक  ढांचा  मजबूत करना होगा और पार्टी में जो विचारधारात्‍मक उहापोह व्याप्त हुआ है उसे दूर करना होगा. जिस राज्य में जैसा शूट करे वैसा लिबास  पहनने से बात  बनाती नहीं बिगड़ती है और वैसा ही आज कल बंगाल मंे हो रहा है. वहाँ की इकाई एक अल्पसंख्यक दल से गंठजोड़  कर  रही है और उस पर कांग्रेस के देश के वरिष्ठ नेता और बंगाल कांग्रेस की नेता पिल पड़े  है ऐसी स्थिति किसी भी दल के लिए ठीक नहीं है और कांग्रेस में तो हर राज्य में यही हाल है, ना जाने कितने गुट है, ना जाने  कितने नेता है और ना जाने कितने मत है, इसमें कांग्रेस का मत कहीं गायब  होता जा रहा है. इसके लिए पार्टी में देश व्यापी  मंथन और एक बार पुन नीति निर्धारण जरूरी है और जो विचारधारात्‍मक  उहापोह को दूर कर कार्यकर्ताओं में स्पष्टता ला सके. उसके बाद उसके विपरीत उल्टा सीधा करने वालों से सख्ती से निपटे तभी बात बनेगी. 

कांग्रेस आला कमान ने गठबंधन की राजनीति को इतनी तवज्जो दी  कि उनका पूरा ध्यान अपने संगठन  से हट गया. उससे उन्हें सत्ता सुख तो मिला परन्तु उनके संगठन का  बंटाधार  हो गया और  छिन्न भिन्न हो गया है. कुछ दिन तो गठबंधन के बल बूते सत्ता सुन्दरी  का मजा  मिला परंतु जैसे-जैसे सत्ता के मद में कांग्रेस और उसके सहयोगी दल जनता का विश्वास खोते गये आैर घोटालों,वंशवाद और भ्रष्‍टाचार की दल-दल में धंसते गये उनकी हालत दिनोंदिन पतली हो गयी और आज भी यदि कांग्रेस को लगता है कि सत्ता विरोधी नारों से या बेदाग दलों के सहयोग से वह दुबारा अपना खोया वजूद वापस पायेगी तो वह भयानक मुगालते में है और कहीने उसकी हालत ऐसी ना हो जाय कि Òअब पछताए होत का जाब चिड़िया चुग गयी खेतÓ. आवश्‍यक है वह समय रहते चेत जाय नहीं तो आज वह जिस दल दल में फंसी है उसे निकल पाना मुश्किल है वह अपनी स्थित सब कुछ गवां के होश में आये तो क्या हुआ वाली ना बनाये. कंाग्रेस आलाकमान अभी भी पार्टी के दुरावस्था के कारण्‍ाों का विश्‍लेषण करने से बच रही है, जो उसके लिए घातक है।


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