यह कैसी राजनीति?

यह अनायास ही नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी अधिकांश राजनीतिक सभाओं में हमारे देश की राजनीति में व्याप्त परिवारवाद को प्रमुख मुद्दा बनाते हैं. यह बीमारी एक दो राज्यों में नहीं देशव्यापी है. किसी भी राजनीतिक पार्टी का नाम ले लो सपा, बसपा, कांग्रेस, राकांपा, दक्षिण के राज्यों के क्षेत्रीय दल, टॉर्च लेकर भी ढूंढेंगे तो कोई एकाध ही मिलेगा, जिसमें यह बीमारी न हो. फिर भी इसमें यदि किसी को प्रथम क्रमांक जाएगा, तो वह अपने को धुर समाजवादी कहने वाले सपा नेता मुलायाम सिंह यादव को ही जायेगा. एक जमाने में उनके परिवार के दर्जनों लोग राज्य के स्थानीय निकायों, विधायिका और संसद के दोनों सदनों में पार्टी का और परिवार का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.  आज भी वह संख्या अच्छी-खासी है और इस बार के होने जा रहे स्थानीय निकाय चुनावों में ऐसे समीकरण बन रहे हैं कि कई दशक बाद सैफई विकास खंड में आरक्षण के चलते मुलायम परिवार का कोई व्यक्ति शायद ब्लाॅक प्रमुख नहीं बनेगा, तो यह बात राष्ट्रीय सुर्खी बन रही है. यही हाल सपा, बसपा, टीआरएस, ममता की पार्टी (टीएमसी), अब्दुल्ला की पार्टी (पीडीपी), देवगौड़ा की पार्टी (जनता दल) का भी है. जिस तरह से सारी प्रजातांत्रिक मान्यताओं, परंपराओं को बताकर ये अपने परिवार को ही प्रमुखता देते हैं और पार्टी को परिवार की कंपनी की तरह संचालित करते हैं. वह तब तक तो ठीक रहता है, जब तक उसके मुखिया की चलती है, नहीं तो आज इन सभी दलों में सत्ता की मलाई के लिए परिवार की पार्टी में अपनी चलाने के लिए परिवारजनों के बीच मतभेद और लाॅग डांट, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश में हास्यास्पद स्थितियां पैदा कर रहे हैं. जिसमें पिसता है तो कार्यकर्ता, क्योंकि उसका भी विकास इस बात पर निर्भर रहता है कि वह परिवार के किस खेमे में है और उसकी चलती है कि नहीं. यदि चलती है तो ठीक है, नहीं तो उसे कुछ नहीं मिलने वाला. इन सबकी सिरमौर  कांग्रेस पार्टी है. जिसकी परिवारवाद को लेकर चारों ओर से लम्बे समय से आलोचना हो रही है, हमले हो रहे हैं, इससे पार्टी का बंटाधार भी हो रहा है. लेकिन न परिवार और न ही परिवार भक्‍तों पर इससे कोई फर्क पड़ रहा है, उनकी भक्ति जारी है. इससे देश में चाटुकारिता का, सत्ता को अपने निहित स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करने का, भ्रष्टाचार का, अवांछनीय तत्वों को प्रश्रय देने का एक ऐसा सिलसिला चला, जो देश की सियासत को लेकर एक अनुचित अवधारणा देश के जनमानस के अन्दर भरता गया. सक्षम, स्वाभिमानी और योग्य व्यक्ति राजनीति से दूर होते गये और स्वयंसेवियों का बोल-बाला हो गया. जिन्होंने इसे बरकारार रखने के लिए सबकुछ किया. जाति का दांव खेला, क्षेत्र का दांव खेला, भाषा को हथियार बनाया, गलत लोगों को आगे बढ़ाया, अल्पसंख्यक परस्ती को नया स्वरूप प्रदान किया और आज ये सब गोलबंद होकर या अकेले पुनÑ वही दिन वापस लाने के लिए जद्दो-जहद कर रहे हैं. कारण 2014 से लेकर आज तक देश में और अधिकांश राज्यों में भाजपा नीत सरकारें इन दलों की मान्यताओं और नीतियों को दरकिनार कर रही हैं. उनके लिए देश और राज्य प्रमुख है और सर्व समाज उसका है. इस दृष्टि से शासन चला रही हैं. इससे इन सबकी दुकान बंद होने की कगार पर है, कारण इस नए दौर में इनकी दशकों से पारिवारिक चौधराहट पर संकट आ गया है, जिसे यह पुनÑ जीवित करना चाहते हैं, तो अब देश के जनमानस को यह तय करना है कि वह किस तरह का देश चाहता है. वह पुरानी लूट के दिन या देश और राज्य का विकास चाहता है. यदि देश और राज्य का विकास चाहिए है, तो उसे ऐसे लोगों को नकारना होगा, जो राजनीति की उनकी पुरानी सोच जिस पर चलते उन्होंने लोगों को बेवकूफ बनाया और राज्यों को बीमारू बनाया, से तोबा करना होगा. उनके लिए परिवार ही राज्य या देश है. ऐसी सोच को चुनौती देने वाले विच्‍ाारधारा को मजबूत करना होगा, तभी बात बनेंगी. परिवारवाद की राजनीति कभी आगे ले जाने वाली राजनीति नहीं रही. पीछे ही ले जाती रही है. 


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