मुखौटे से भला नहीं होगा विपक्षी दलों का

एक जमाने में अल्पसंख्यकपरस्ती को ही धर्मनिरपेक्षता मानने वाले दलों की आज जो हालत है, उससे उनके नए भारत में हुए बदलावों को आत्मसात ना कर पाने और वक्त की मांग के अनुसार पैदा होने वाले चुनौतियों का सामना करने के लिए अपने आपको ढाल ना पाने की विवशता दिग्दर्शित होती है. बंगाल का चुनावी मैदान और उसकी सत्ता के लिए मची लाग डांट में इस विचारधारात्मक उहापोह का सबसे जीता जागता प्रमाण पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता हैं, जो पिछले 10 सालों से उक्त राज्य की मुख्यमंत्री हैं. प्रचार में अपने अब तक के कार्यकाल की उपलब्धियां गिनने की बजाय, जिस तरह मंदिर से लेकर दरगाह तक चक्कर लगा रहीं हैं, मत्था टेक रही हैं. उनके बिना कहे बहुत कुछ कहता है. यह बताता है कि वह भाजपा के आक्रामक हिन्दू वादी एजेंडे के, उसके विकास के मॉडल का मुकबला नहीं कर पा रही हैं और वह पूरी तरह दबाव में हैं और कुछ भी कर रही हैं. यदि वह इतना दबाव महसूस कर रही हैं तो उनके आम कार्यकर्ता का क्या हाल होगा? अनायास ही नहीं है िक उनके पार्टी के लोग थोक के भाव में पार्टी छोड़ भाजपा का दामन थाम रहे हैं. हमारे सविधान में देश के हर नागरिक को अपने -अपने धर्म का अपनी तरह से पालन करने की आजादी है. भाजपा को छोड़ कर देश में सक्रिय हर पार्टी अल्पसंख्यकपरस्ती में लगे हैं. जैसे कि ममता बनर्जी का मामला सामने आया, इन्हें जय श्रीराम बोलने पर भी आपत्ति थी, उन्हें उस से परहेज था, इसके िलए उच्च न्यायालय में याचिका तक की गयी, जिसे न्यायलय ने ख़ारिज कर दिया. राजनीति में कैसे- कैसे खेल होते हैं इसकी यह ताजातरीन बानगी है. भाजपा नीत केंद्र और राज्य सरकारों ने धर्मनिरपेक्ष दलों की यानि कांग्रेस, सपा, बसपा, टीएमसी, राजद, जदयू और अन्य तमाम दलों से अलग राजनीति का स्वरूप जनता के सामने रखा, जिसमे देश के सर्व समाज के विकास को जगह है. बहुसंख्यक समाज के प्रतीकों और आस्था और हर मसाज के प्रतीकों आस्था को यथोचित सम्मान है, उन पर गर्व है, लेकिन अल्पसंख्यक परस्ती को कोई जगह नहीं है. परिणामस्वरूप धर्म के नाम पर अपनी दुकान चला रहे राजनीतिक दलों और अल्पसंख्यक समाज के नेता दोनों पर संकट है. 2014 से इन्होने सब कुछ कर के देख लिया. सत्ता पक्षा को घेरने की हर तरह की कोशिशें हुई, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा, उसके कार्यों का और उसकी पार्टी का परचम दिनों दिन और तेजी से लहराता गया और लहरा रहा है. परिणामत: िवरोधियों के सामने यक्ष प्रश्न यह है कि उसका समाना कैसे करें. कोई संगम में डुबकी लगा रहा है, कोई मंदिर- मंदिर जा रहा है और इसके चलते जनता और उनके कार्यकर्ताओं दोनों का उन्हें लेकर संभ्रम बढ़ता ही जा रहा है. शेर की खाल ओढ़कर सियार शेर नहीं हो जाता. इस दन्त कथा से निरपेक्ष दलों को सबक लेना चाहिए. चकत्ता लगाने से उनका असली चेहरा जो कई दशकों से जनता ने देखा है और उसे खारिज कर चुकी है. वह नया मुखौटा पहन लेने से नहीं बदलेगी. उनकी विचारधारा गलत नहीं है, लेकिन वे भाजपा की तरह उस पर उनके दलों की उत्पत्ति के बाद से आज तक टिके नहीं रहे और जिस राज्य में जैसा सूट करता था, वैसा मुखौटा पहनते गए. अब उनकी असलियत जनता जनार्दन के समाने उजागर है. उनका मुकाबला अपने मूल सिद्धांतों पर टिके रहने वालों से हैं, जो सत्ता के लिए कोई भी मुखौटा कभी नहीं पहनते, जबकि निरपेक्ष दलों के पास सिर्फ मुखौटा ही बचा है. उनकी विचारधारा जो आज भी सही है, प्रासंगिक है और जिसमें सिर्फ वक्त के मुताबिक़ सुधार- संसोधन करने की जरूरत थी, लोगों की नजरों में संदिग्ध हो गयी है. जब तक इसका समाधान नहीं हो जाता और जनता को यह विश्वास नहीं हो जाता कि यह अपनी विचारधारा पर टिके रहने वाले लोग हैं और इनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है, तब तक इन दलों का कोई महत्व है ऐसा नहीं लगता. मुखौटा बदलना सिर्फ हास्य का पात्र ही नहीं बनाता, बल्कि जनता के नजरों में इन दलों और नेताओं को अविश्वसनीय बनाता जा रहा है और दिनो-दिन इनकी हालत खराब हो रही है और इनके अस्तित्व पर संकट बढ़ता जा रहा है. जिस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के बजाय और उस पर सुधारात्मक कदम उठाने के बजाय ये किसी भी तरह अपने को प्रासांगिक बनाय रखने के लिए जो नौटंकी कर रहे है वह सिर्फ जनता का मनोरंजन कर रहा है.


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