राज्यों को सही दिशा में सोचने की जरूरत

मराठा आरक्षण मामले में उच्च न्यायालय में सुनवाई हो रही है. सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने देश के सभी राज्यों को नोटिस जारी कर यह जानना चाहा है कि क्या आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ाई जा सकती है. यह सबसे बड़ा सवाल है और इस पर राज्य सरकारों से यह अपेक्षा व्यक्त किया जाना गलत नहीं है कि वह अपनी राय मत बैंक को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि यथार्थता के धरातल पर खड़ा होकर और यह ध्यान में लेकर करे कि अब तक आरक्षण जिसे इसके संकल्पनाकारों ने एक नियत समय के लिए किया था और जिसे क्षुद्र राजनीति ने और संकीर्ण मानसिकता के नेताओं ने एक राजनीतिक हथियार में तब्दील कर दिया है और आज यह एक लोक-लुभावन अस्त्र बन गया है. वह देश हित में कितना सही और जरूरी है. हर रोज नए-नए समाजिक या जातीय घटकों द्वारा उन्हें इसकी परिधि में लाने की मांग समाने आ रही है, आक्रामक आंदोलन हो रहे हैं, रोज चेतावनियां दी जा रही हैं. इनमें ऐसे सामाजिक घटक भी आरक्षण पाने की रेस में शामिल हो रहे हैं, जिन्हें परंपरागत रूप से समृद्ध माना जाता रहा है. और जिनका विभिन्न राज्यों की राजनीति या समाज में अच्छा रसूख है. दूसरी ओर हर जाति वर्ग के ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है, जो इसे कालवाह्य मानते हैं और देश के प्रगति में रोड़ा मानते हैं. इससे कामगारों या कर्मचारियों की गुणवत्ता प्रभावित होती है. देश के टैलेंट का उपयोग नहीं हो पाता है और देश से टैलेंट के पलायन आदि में भी इसका योगदान मानते हैं. करीब-करीब देश का सर्वसमाज इस मत का है की शोषित पीड़ित, वंचित वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को वह हर सहूलियत मिले, जिससे वे पढ़ाई-लिखाई में किसी भी बच्चे से पीछे ना रहें, लेकिन नौकरियों में चयन उनकी योग्यता और पात्रता के अनुसार ही हो. आर्थिक रूप से कमजोर तबका के सर्वसमाज के बच्चों को वे सभी साधन सुविधाएं सरकार उपलब्ध कराये जो किसी संपन्न परिवार के बच्चे को उपलब्ध हैं. इससे कोई गुरेज नहीं, लेकिन शिक्षा मुफ्त दो, भोजन, आवास की व्यवस्था करों उसके बाद नौकरी में भी आरक्षण दो यह उचित नहीं लगता है. ऐसा आरक्षण के विरोधियों का मानना है. उनका यह भी तर्क है कि आरक्षित श्रेणी में आने वालों की एक बड़ी आबादी स्वतंत्रता के अब तक के साढ़े सात दशकों में काफी आगे आई है. उनकी भी गिनती श्रीमंतों में होती है, ऐसा लोगों को अभी आरक्षण देने की क्या है जरूरत है. यह मुद्दा चुनावी रूप से इतना विस्फोटक है कि इनमें से कई बातों पर सहमत होने के बावजूद भी नेतागण इस पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी करने से बचते हैं और इसे तूल नहीं देना चाहते हैं, तो राजनीति के लिए ऐसे मुद्दे को सजीव बनाये रखना, जिसमें आने के लिए विभिन्न सामाजिक घटकों में प्रतियोगिता हो रही है, सही नहीं है. इस बिन्दु पर देशव्यापी चर्चा होनी चाहिए और राज्य सरकारों को जिनसे उच्च न्यायालय ने इसे लेकार सवाल पूछा है इस व्यवस्था के पक्ष और प्रतिपक्ष से जो बाते  सामने आ रही उन बातों पर गंभीरता पूर्वक विचार कर, उस पर मंथन कर अपनी राय रखनी चाहिए और जो देश हित में हो. साथ ही साथ समाज के पिछड़े तबके को और सर्व समाज के आर्थिक रूप से कमजोर तबके को हर तह से अपना विकास करने का अवसर प्रदान करे. ऐसा रास्ता सुझाएं या वैसी व्यवस्था बनाए जाने के सन्दर्भ में अपनी राय दें. मत बैंक को दृष्टि में रख कर बनाई गयी नीतियों ने इस देश का काफी बंटाधार किया है. इस तरह की नीतियां बनाकर या अपनाकर लोगों को लोगों से जोड़ने की बजाय बांटने का काम ना हो ओर पात्र व्यक्ति को न्याय भी मिले ऐसी सोच जरूरी है. दुर्भाग्य से हमारी राजनीति में लम्बे समय से अपना हित और अपनी पार्टी का हित सर्वोपरि रखा और देश हित उसके पीछे हो गया है. इसलिए कई ऐसी बातें जिन पर समय-समय पर बदलाव होना चािहए था, उनकी समीक्षा होनी चाहिए थी वैसी ही चलती रहीं और वह दिनो-दिन विकराल रूप अख्तियार करती जा रही है. जिनपर सामयिक विचार और देशहित को ध्यान में रखकर कदम उठाना जरूरी है. उम्मीद है इस बिन्दु पर भी राज्य सरकारें अपनी टालू नीति का परित्याग कर यथार्थता के धरातल पर विचार करेंगी.


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