यूपी में पंचायत चुनाव की सरगर्मियां

उत्तर प्रदेश में निकाय चुनावों की तारीखों की घोषणा होते ही गांव के चैपालों में इसे लेकर सरगर्मियां शुरू हो गयी हैं। पोस्टरबाजी, नारेबाजी, चुनावी हुड़दंग का दौर शुरू हो गया। उम्मीदवारों के घरों पर मुर्गा-मच्छी की पार्टी और दारू पीने-पिलाने का काम पहले से जारी है, लेकिन चुनावी अधिसूचना के बाद यह और गति से होने लगा। कच्ची शराब की भट्टियां चूल्हों पर चढ़ने के साथ-साथ वोटरों के बीच उम्मीदवारों की घेराबंदी भी आरंभ हो गईं। ग्राम प्रधान, जिला पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत सदस्य, बीडीसी व ग्राम पंचायत सदस्य, ये ऐसे ओहदे हैं जो ग्रामीणों के लिए सांसद-विधायकों से कहीं बढ़कर होते हैं। इन चुनावों का दूसरा रूप एक ये भी है कि आपसी रंजिश को खुलेआम जन्म देते हैं। गांव में मुठ्ठी भर लोग होते हैं और पूरी पंचायत में ज्यादा से ज्यादा हजार या दो हजार की ही आबादी होती है। चुनाव के पहले तक आपस में सभी बड़े अदब और अमन शांति से रहते हैं। लेकिन चुनाव इन्हें आपस में बांट देता है। प्रधानी चुनाव में प्रत्याशी ऐसे हथकंडे भी अपनाता है जिसकी कोई कल्पना नहीं करता। वोट हासिल करने के लिए किसी हद तक चले जाते हैं। चुनाव के वक्त वोट नहीं देने पर कई उम्मीदवार वोटरों को खुलेआम प्रताड़ित भी करते हैं, जो कई मर्तबा बड़े-बड़े हादसों में तब्दील हो जाते हैं। लोकल बाॅडी के चुनाव कराना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती से कम नहीं होता। साफ-सुथते चुनाव कराना सूबे की हुकूमत के लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि अगले ही साल विधानसभा के चुनाव होने हैं। पंचायतों में चुनाव ही नहीं कई और सुधारों की दरकार है। पंचायतों में भ्रष्टाचार का खेल किसी से छिपा नहीं है। इसका एक कारण ये भी है कि ग्रामीण जनता अपने अधिकारों और सरकारी योजनाओं से अनभिज्ञ होती है। चुनाव जीतने के बाद प्रधान और ब्लॉक अधिकारियों की मिलीभगत से योजनाओं में जमकर घालमेल होता है। आवास का आवंटन पात्र की जगह अपात्र को कर दिया जाता है। शौचालयों के निर्माण में दोनों मिलकर घूस खाते हैं। दरअसल, उन्हें कहने सुनने वाला कोई नहीं होता। क्योंकि वोटर अपने वोट को पहले ही नीलाम कर चुका होता है। चुनाव के दौरान प्रधानों की पार्टी खाकर और दारू पीकर अपने वोट को बेच चुका होता है। सरकारी पैसों की बंदरबांट पर प्रधान, सचिव आदि अधिकारियों के खेल में सरकार और स्थानीय जिला प्रशासन की चुप्पी भी कई तरह के सवाल खड़े करती है। ऐसी शिकायतों की भरमार है, जिनमें प्रधान-अधिकारी बगैर काम किए लाखों रुपए फर्जी तरीके से उड़ाए हों। ग्राम पंचायतों में फर्जी फर्मों के बिल लगाकर प्रधानों का सरकारी राशि में गोलमाल की खबरें आती ही रहती हैं। कई नप भी जाते हैं। चुनाव जीतने के बाद गांव के सरपंच सीधे-सादे लोगों का जमकर फायदा उठाते हैं। इस तंत्र पर हुकूमत को चाबुक चलाना चाहिए। आवंटित राशि ऑनलाइन बैंक खातों में भेजी जाती है, फिर भी सेंधमारी हो जाती है। बहरहाल, ऐसे कारनामों और पंचायत चुनाव की आहट के बीच विशेषकर उत्तर प्रदेश की सरकार और पुलिस-प्रशासन ने चुनावी रंजिश में होने वाली वारदातों पर लगाम लगाने के लिए रणनीति तैयार की है। डीजीपी मुख्यालय ने सभी जिला कप्तानों को अलर्ट कर दिया है। प्रत्येक जिला और तहसीलों में नजर रखने के लिए नोडल अधिकारियों को भी लगाया जाएगा। जिनको चुनावी रंजिश में हुई घटनाओं का तत्कालीन ब्यौरा देना होगा। दरअसल, सख्त और कठोर सतर्कता बरतनी भी चाहिए, नहीं तो माहौल की पुनरावृत्ति इस बार भी होगी। निकाय चुनावों की तस्वीर दूसरे चुनावों से अलहदा होती है। पंचायत प्रत्याशी अंत तक यह अनुमान नहीं लगा पाते कि उनके पक्ष में कौन है, कौन नहीं? मतदाताओं को भी पता होता है जितना मुर्गा उचेलना है उचेल लो, जितनी शराब पीनी है पी लो। प्रधान बनने के बाद तो कोई हाथ आएगा नहीं? वहीं उम्मीदवार का भी दिमाग चकराया रहता है। रात में जो मतदाता उनके घर मुर्गा खा रहे थे, दूसरे दिन विरोधी प्रत्याशी के यहां दारू पीने में मशगूल दिखते हैं और अगले दिन किसी तीसरे उम्मीदवार के यहां पार्टी करते दिखाई देते हैं। झगड़े यहीं से शुरू हो जाते हैं, जब उम्मीदवार उन्हें टोकता है कि मुर्गा खाते वक्त वोट देने का वायदा उन्हें किया था। तनातनी बढ़ती है और ऐसी घटनाएं कई बार बड़े हादसों में बदल जाती हैं। बड़े चुनावों में ये सब नहीं होता। लोकल बाॅडी चुनाव में मतदाता प्रत्याशियों को बुरी तरह से उलझाए रखते हैं, आखिर तक अपने पत्ते नहीं खोलते। ग्रामीण वोटरों के मनोविज्ञान को समझना अच्छे-अच्छों की बात नहीं होती। बड़े-बड़े चुनावी पंडित और समीक्षकों के आंकड़े भी सटीक नहीं बैठते। पंचायत चुनाव का एक ही फंडा होता है, जिसके ज्यादा खर्चे, उसके उतने ही चर्चे। उम्मीदवार तब और पसोपेश में पड़ जाता है, जब मतदाता उन्हें सीधे तौर पर इंकार नहीं करते। वोट देने के लिए आत्मविश्वास के साथ हामी भर देते हैं। वोट देने की बात मतदाता किसी एक उम्मीदवार से नहीं, बल्कि सभी से करते हैं। ऐसी तस्वीरें देखकर प्रत्याशियों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। चुनाव के वक्त ऐसी स्थिति किसी एक गांव नहीं, बल्कि प्रत्येक गांव की यही हालत रहती है। पंचायत चुनाव के मतदाता बहुत चतुर और तेज होते हैं। सबको बारी-बारी से आंकते-नापते हैं कि कौन कितना ज्यादा खिला-पिला रहा है। स्थिति ऐसी होती है कि पंचायत उम्मीदवार अपने करीबी के सिवाय अन्य पर जरा भी भरोसा नहीं कर पाता कि आखिर उनके साथ है कौन? पांव से लेकर चोटी तक ताकत झोंकने और जमकर मुर्गा-दारू पर पैसा खर्च करने के बाद उम्मीदवार जीत को लेकर आश्वस्त नहीं हो पाते। बदलाव के दौर में ये परिपाटी भी बदलनी चाहिए, पंचायत चुनाव का मकसद मुर्गा-दारू की पार्टी तक सीमित नहीं होना चाहिए, मकसद विकास और विश्वास होना चाहिए। बड़े चुनावों की तरह खर्च की काूननी बाध्यता हो, दारू पर चुनाव के वक्त पूर्ण प्रतिबंध हो।


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