तू डाल-डाल मैं पात-पात का खेल

पांच राज्यों में चुनाव प्रचार चरम पर है. सर्वत्र आरोप -प्रत्यारोप, लोक-लुभावन वादों और विकास की नई गाथा लिखने और सतारूढ़ दल को नकारा साबित करने के लिए रैलियों, रोड शो और ना जाने क्या-क्या हो रहा है. जिन राज्यों में चुनाव रूपी प्रजातंत्र का उत्सव हो रहा है हर जगह लाग-डांट का दर्शन स्वाभाविक है, लेकिन बंगाल इस चुनावी समर का इस बार सबसे दिलचस्प आखाड़ा बन गया है. देश के नव जागरण काल में देश को नई दिशा देने का काम करने वाला बंगाल जो एक जमाने में देश के प्रगति का हर तरह से अगुवा था कतिपय कारणों के चलते पीछे चला गया. आज कई बिन्दु पर कई राज्य उससे काफी बढ़िया कर रहे हैं, लोग इसके पीछे राज्य में वामदलों की सरकारों का लम्बी पारी खेलना मान रहे हैं. जिन्होंने बदलते वक्त की मांग के अनुसार बंगाल को ढालने में अपनी सही भूमिका नहीं निभाई. वह सत्ता में ही मस्त रहे और बंगाल पीछे खिसकता गया. काफी जद्दोजहद के बाद ममता बनर्जी ने उन्हें सत्ताच्‍युत किया और इस बार वह मुख्यमंत्री के रूप में दूसरा टर्म पूरा कर चुकी हैं और तीसरी पारी के लिए चुनावी समर में हैं. उनके पास अभी तक ऐसा कुछ नहीं है, जिसे वह यह बता सकें कि उनके राज में बंगाल में कुछ बदलाव हुआ है, ऐसा नहीं लगता है. राज्य जिस तरह हिंसा, भ्रष्टाचार के लिए वामदलों के शासन काल में जाना जाता रहा है वैसी ही यथास्थित उनके कार्यकाल में भी बरकरार रही. शासन में उसकी रीति-नीति में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं नजर आया. नई पार्टी भले ही सत्तासीन हुई, परन्तु शासन के तौर तरीकों में कोई आमूल चूल बदलाव नहीं हुआ. परिणामतः बंगाल पीछे ही रहा. भाजपा ने 2014 से ही बंगाल पर अपना परचम लहराने का प्रयास तेज किया और शुरू से ही इन कमियों को और कालांतर में उनमें आई अन्य कमियों मसलन परिवारवाद को, अल्पसंख्यक परस्ती को मुद्दा बनाकर और बंगाल के विकास को मुद्दा बनाकर उन्हें घेरना शुरू किया और जैसे-जैसे चुनाव आते गए उसकी आक्रमकता में भी इजाफा होता गया. जिसका प्रतिफल उन्हें गत लोकसभा चुनाव में शानदार सफलता से मिला और इस बार तो भाजपा जिस तरह ताकत झोंक रही है, जिस तरह प्रधानमंत्री, केन्द्रीय गृह मंत्री, पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष और अन्य आला नेता बंगाल में चुनावी समर में कूदे हैं, वह अभूतपूर्व है. पार्टी हर हाल में बंगाल फतह करना चाहती है. वहां तीसरा मोर्चा भी है जिसमें कांग्रेस, वाम दल और नवागत अल्पसंख्यक दल शामिल हैं और ओवैसी की एमआईएम भी सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारकर अपनी वोटकटुवा की भूमिका निभाने को तैयार है, लेकिन असली लड़ाई ममता और भाजपा में ही दिखाई दे रहे है. दोनों किसी अन्‍य दल का भले ही नाम लें, लेकिन असली निशाना दोनों एक-दूसरे को ही बना रहे हैं. चोटिल होने, पार्टी से बड़े पैमाने पर पलायन होने के बाद भी जिस तरह वे मोर्चे में डटी हैं यह उनकी दुर्दमनीय इच्छाशक्ति का परिचायक है और उनकी उस जीवटता का दर्शन कराती है, जिसके बलबूते उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर वामदलों से लोहा लेकर बंगाल की सत्ता पर अपना परचम लहराया है और गत दस साल से उस पर काबिज हैं. लेकिन इस बार उनका मुकाबला भाजपा से है, जो देश में विकास की नई गाथा लिखने के लिए जानी जा रही है और राजनीति का नया ककहरा और तौर तरीका कांग्रेस और उससे ही उद्भूत तमाम तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों को सिखा रही है. जिनकी यूएसपी परिवारवाद, अल्पसंख्यक परस्ती, क्षेत्रवाद और भ्रष्टाचार रहा है और जिनका इस्तेमाल कर भाजपा उन्हीं को पटखनी दे रही है, तो अब जबकि पहले चरण का प्रचार समाप्त हो गया है और मतदान होने में कुछ घंटे बाकी हैं भाजपा और ममता के मध्य बंगाल की सत्ता के लिए खेला जा रहा तू डाल-डाल, मैं पात-पात का खेल क्या गुल दो मई को खिलाता है इस पर पूरे देश की नजर है. दीदी की राह इस माहौल में यदि असंभव नहीं तो मुश्किल भरी जरूर नजर आ रही है.


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