घेरे में ड्रैगन और उसकी कठपुतली

एशिया प्रशांत क्षेत्र में सहयोग के लिए बने क्वाड गठबंधन के पहली समिट में जिस तरह हमारे देश की जय-जयकार हुई उसकी प्रतिध्वनि चीन में सुनाई देना शरू हो गई है. एशिया का नाटो के रूप में जाना जाने वाला यह गंठजोड़, जिसमें अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया सम्मिलित हैं. यह, जहां एक अोर विस्तारवादी नीति के प्रेणता और इस क्षेत्र का चौधरी बनने के आकांक्षी चीन को इशारा है कि वह अपनी आदत सुधार ले, नहीं तो आगे की डगर काफी कठिन है. वहीं, दूसरी अोर यह हमारी बढ़ती ताकत की विश्वव्यापी स्वीकृति है. जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 से हमारी सरकार काम कर रही है, उससे भारत के नए तेवर की जो गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है और जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कोरोना महामारी से हम लड़ाई लड़ रहे हैं और रिकाॅर्ड समय में हमने दो-दो वैक्सीन तैयार की हैं और जिस तरह उसे दुनिया भर में उपलब्ध करा रहे हैं और जिस तरह महामारी के इस दौर में शुरू से ही हमारे देश ने दुनिया के केमिस्ट की भूमिका निभाते हुए सभी को दवाईंयां उपलब्ध कराई हैं, निःसंदेह दुनिया भर में हमारे कद में अभूत पूर्व इजाफा हुआ है और दुनिया में प्रगत राष्ट्रों की सूची में अपना नाम दर्ज करने के लिए भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है. यह काम सिर्फ एक मोर्चे पर नहीं, बल्कि व्यवस्था के हर अंग पर हो रहा है. जिसकी गूंज पूरी दुनिया में है, इसलिए गर्मजोशी से क्वाड नेताओं द्वारा हमारे प्रधानमंत्री का स्वागत करना यह नए और आत्मनिर्भर भारत का अभिनंदन है, जो हर भारतवासी का सीना गर्व से ऊंचा करने वाला है. चीन की विस्तारवादी सोच में भारत सबसे बड़ा रोड़ा है. उसे एक नहीं दो-दो बार पीछे हटने को हमने मजबूर किया है. पहले डोकलाम में और अब लद्दाख में. यही नहीं इंडो चाइना सी में भी जो स्वप्न वह देख रहा था. पहले से ही खतरे में था, अब क्वाड के चलते कभी पूरा होगा, इसकी सम्भावना बिल्कुल नहीं है. स्वाभाविक है, इससे चीन की छटपटाहट बढ़ रही है, क्वाड को संबोधित करते हुए जो बाइडन ने कहा है कि अमेरिका इस क्षेत्र की स्थिरता यानी दक्षिण एशिया में स्थिरता बनाए रखने के लिए आपके यानी भारत, ऑस्ट्रेलिया और  जापान के साथ काम करने के लिए प्रतिबद्ध है. यह इशारा उसी की अोर है, यह चीन जानता है. कारण इस क्षेत्र की शांति और स्थिरता को संकट में डालने का काम चीन की अोर से हमेशा होता रहा है और हो रहा है. अभी भी उसके मंसूबे ठीक नहीं हैं, यह दुनिया जानती है, तो दुनिया भी उससे निपटाने की तैयारी में है. यह जानकर वह प्रसन्न नहीं होगा।  

इन सबके मद्देनजर उसके मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स की टिप्पणी कि यह एक घटिया रणनीतिक निर्माण है. इससे जापान और भारत को कोई फायदा नहीं होगा या एक इंच भी जमीन नहीं मिलेगी आदि। उसके मुखपत्र के उद्गार ‘खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे’ से ज्यादा कुछ नहीं है. उसने अपने गुरूर में दुनिया में हम जैसे पड़ोसियों के खिलाफ, छोटे-छोटे दूसरे देशों के साथ ऐसे-ऐसे कुचक्र रचे कि आज दुनिया में उसका और उसके मंसूबों का पूरी तरह पर्दाफाश हो चुका है. उसने यह भली-भांति जान लिया है कि यदि उसने कोई अनुचित हिमाकत की तो हम उसका सामरिक स्तर हो या कूटनीतिक हर मोर्चे में प्रभावी जबाब दे सकते हैं और आर्थिक रूप से भी उसकी घिग्घी बंद कर सकते हैं. चीन अब घिर चुका है, इस हकीकत से पाक भी रूबरू हो चुका है. इसलिए हमसे शांति पाठ का प्रस्ताव कर चुका है और चीन के विदेश मंत्री भी शांति का राग अलाप चुकें हैं. कारण उनकी ही चालों से उनका हमसे माल काटना बंद हो चुका है, जिसे उनको काफी आर्थिक परेशानी भी है, लेकिन ये आसानी से सुधरने वाले नहीं है, ऐसा हमारा अब तक का अनुभव रहा है और वह भी कड़वा। जब ये दोस्ती की बात करते हैं तो उस दौरान कोई ना कोई षड्यंत्र रचते रहते हैं, इसलिए हमने भी किसी भी तरह की ढील नहीं दी है और इन पर हमेशा तीखी नजर रखते हुए ये सर ना उठा सकें इस संदर्भ में सामरिक तैयारी या कूटनीतिक रूप से है, उसकी तैयारी कर रहे हैं. यही इनसे निपटने का सबसे मुफीद तरीका है. इस बार ड्रैगन और उसके साथ उसकी कठपुतली पाक दोनों को पता चल चुका है कि वह घिरे हैं और उन पर तीखी नजर है, और दुनिया में उनका कोई हमदर्द नहीं है. तभी यह सही राह चलने का दिखावा कर रहे हैं। जब तक यह विश्वास नहीं हो जाता कि इनकी नीयत सचमुुुच बदली है। इन पर सख्त नजर जरूरी है। 

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