फागुन का खुमार


"फागुन का खुमार” यह शीर्षक मुझे 50 साल पहले के अपने अतीत में, अपने बचपन में ले गया। पूरा घटनाक्रम सही ढ़ंग से याद नहीं, पर जो धुंधली यादें है उन्हें पन्नो पर उतार रही हूँ। यूं तो हम हर साल गर्मियों की छुट्टियाँ गांव में बिताया करते थे। पर उस वर्ष हम होली का पर्व मनाने गांव गये हुये थे। हमारे गांव में हर मोहल्ले की सफाई करने वाला एक परिवार निश्चित होता था। साथ ही हर घर-मुहल्ले में काम करनेवाली, जापा करने वाली दाईयां भी निश्चित होती थी।

उस वर्ष हमारा पूरा परिवार गांव गया हुआ था। हमने देखा कि मुहल्ले की सफाई करनवाले जो पति-पत्नी आते थे, वह नहीं थे। बल्कि एक अन्य महिला और उसके साथ 10 साल की एक लड़की थी, जो सफाई में लगी हुई थी। मां ने उसको बुलाकर पूछा, “तुम लोग कौन हो ? जो पहले सफाई करते थे वह कहां है ?” यह सुनकर वह छोटी लड़की रोने लगी। उसके साथ वाली महिला बोली, “यह लड़की उस कामगार की बेटी है तथा वह उसकी पड़ोसन है। पिछले कई दिनों से वह दोनों बीमार हैं। उनके घर में कोई दूसरा कमाने वाला नहीं है। इसलिये उनकी जगह वह दोनों आती है, जिससे कि मोहल्ले से कुछ मदद हो जाये,  खाने-पीने को कुछ मिल जाये तथा वेतन मिल जाये।” मोहल्ले के प्रत्येक घर से उन्हें वेतन के रूप में कुछ राशि दी जाती थी।

मां को यह सुनकर बहुत दुःख हुआ। उन्होंने उस महिला से कहा, “इतनी छोटी सी बच्ची से काम मत कराओं। इसे खेलने-पढ़ने दो।” पर पचास साल पहले गांव में पढ़ाई कहां होती थी। मां ने उन दोनों को बिठाकर भर पेट खाना खिलाया। साथ ही, उसके माता-पिता के लिये भी खाना बांधकर दिया। चारों तरफ मां की सहृदयता के रंग बिखर गए और "फागुन का खुमार' छा गया।

होली के एक दिन पहले जब वह मोहल्ले में आई तो मां ने उसे होली के रंग दिये, मेरे कपड़े भी उसे दिये। साथ ही हिंदी, अंग्रेजी की प्रारंभिक शिक्षा की कुछ पुस्तकें के साथ उसके माता-पिता की दवाईयों के लिये कुछ रूपये भी दिये। इन सभी चीजों को पाकर उस बच्ची के मुख की उदासी पर सुबह की सुनहरी धूप  खिल गई। वह खुशी से नाचने लगी। होली के विविध रंगों की चमक, उसके चेहरे पर चमकने लगी। उसके लिए मानों "फागुन का खुमार"छा गया। मां का यह रूप देखकर मैं, मां के गले लग गयी। मां मुझे आज बहुत अच्छी, बहुत प्यारी और दुनिया की सबसे सुंदर मुस्कुराती मां लगी। कुछ देने में कितनी खुशी होती है, वह उस दिन जाना।

जब हम गांव से मुम्बई रवाना हो रहे थे, वह  छोटी लड़की अपने माता-पिता के साथ हमारे घर आई। वह लोग बहुत खुश थे।  कई बार उन्होंने मां को धन्यवाद दिया, आशीर्वाद दिया। मां ने उनसे वादा लिया कि इतनी छोटी सी बेटी से काम नहीं करायेंगे। उसे थोड़ा पढ़ने देंगे। कम से कम अक्षर-ज्ञान तो उसे मिले। अगली बार वह उसके लिये और किताबें- कॉपियां लेकर आयेगी।

सच में किसी के लिये जब आप कुछ करते हो तो, चारों दिशाओं में फागुन के रंग बिखर जाते है," फागुन की खुमारी" बिखर जाती है। प्रकृति जब सारी खुशियाँ स्वयं में समेट कर प्रस्तुति का बहाना ढूंढ़ती है, तभी तो हमें फागुन और होली जैसा रंगों का त्योहार प्रदान करती हैं।


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