लड़ाई दक्षिण के तीन राज्यों की

मोदी -शाह युग में भाजपा ने उन राज्यों में भी अपना परचम लहरया है जो उसके पहले असंभव लगते थे. भाजपा ने उत्तर पूर्व में अपना डंका बजवाया और बंगाल में इस बार वह सत्ता की प्रबल दावेदार है. उस हिसाब  से उसकी स्थित दक्षिण के राज्यों में बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती. कर्नाटक को छोड़ दें तो अभी भी उसके लिए तमिलनाडू, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, केरल और पुड्डीचेरी चुनौती बने हुए हैं. तेलंगाना के हैदाराबद नगर निगम चुनाव भाजपा ने अपनी  विकास की छवि और आक्रमक राष्ट्रवादी प्रचार शैली में अच्छी सफलता हासिल की, लेकिन इस सफलता को राज्यव्यापी  बनाने के लिए अभी काफी मशक्‍कत की दरकार है, जो भाजपा लगातार कर रही है. उक्त पांच में से तीन राज्यों  में इस  समय चुनावी पर्व उफान पर है.  बंगाल और असम में भाजपा  मजबूत स्थिति में है जहां असम में उसके सामने चुनौती अपनी सत्ता बरकरार रखने की है तो बंगाल में वह इस बार सत्ता पर काबिज होने का स्वप्न लेकर प्रयत्न की पराकाष्ठा  कर रही  है. उसने एक तरह से इन चुनावों में अपने आपको झोंक दिया है,लेकिन इस मतलब यह कदापि नहीं कि वह दक्षिण के राज्यों से गाफिल है. जयलललिता की पार्टी के साथ गठजोड़ कर वह तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में भी अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए और वहां की राजनीति में अपनी पैठ बनाने के लिए गंभीर प्रयत्न कर रही हैं. इसके लिए वह हर संभव  कदम उठा रही हैं. प्रधानमंत्री और अन्य वरिष्ठ नेता वहां प्रचार में  लगे हैं.  रही बात केरल की  तो उसे लेकर भाजपा कितनी गंभीर है. इसका अंदाजा इसी बात से लगया जा सकता है कि उसने वहां मेट्रो मैंन श्रीधरन को अपनी इस नीति  के विपरीत जाकर मैदान में उतारा है कि 75 वर्ष से ऊपर के नेताओं  को चुनाव नहीं लड़ना चाहिए. मतलब साफ़ है कि पूरे देश में अपनी शानदार उपस्थति का आगाज और एहसास करा चुकी भाजपा जिसने विकास और राष्ट्रवाद के अद्भुत संगम वाली राजनीति से  देश की राजनीति में एक नए युग का श्रीगणेश किया है अब दक्षिण में भी अपनी उपस्थिति मजबूत करना चाहती  है. 

तमिलनाडु को छोड़ दें तो जहां कांग्रेस पिछले लम्बे समय से किसी ना किसी द्रविड़ दल के साथ सतत गठजोड़ में है, अन्‍य राज्‍यों मंे उसकी स्थिति एक जमाने में काफी मजबूत थी, लेकिन आन्ध्र के विभाजन और उसके बाद तेलांगना के उद्भव के बाद से ही उसकी हालत इन दोनों राज्यों में काफी पतली है,जबकि केरल में कभी कांग्रेस नीत मोर्चा सत्ता में आता है तो कभी उसका नेतृत्व वाम दल करते हैं.  कर्नाटक में भी कांग्रेस की स्थिति मजबूत रही है. इधर भ्‍ााजपा और उसमें कांटे की टक्कर रही है. इसके मद्देनजर कांग्रेस भी इस इलाके में अपना वर्चस्व बरकरार  रखने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है  और युवराज तो लगभग वहीं डेरा डाले हुए हैं. भाजपा को भी इन इलाकों में अपनी स्थिति का एहसास है, इसलिए उसने भी तमिनाडु में गठजोड़  किया है, केरल में भी कई पार्टियों को अपने साथ जोड़ा है और राष्ट्रवाद के  नारे के साथ परिवारवाद को, भ्रष्‍टाचार को मुद्दा बनाते हुए और अपने विकास मॉडल पर जोर देते हुए अब तक वहां की सत्ता पर काबिज दलों को और कांग्रेस पार्टी को घेरने के लिए आक्रामक  प्रचार अभियान छेड़ दिया है. इस बार दक्षिण के इन तीन राजों की लड़ाई में एक और स्थानीय शक्तियां है जिनके साथ कांग्रेस और भाजपा का चुनावी गठबंधन है और दूसरी गठबंधन के साथ्‍ा ही साथ इन दलों की अपनी- अपनी शक्ति बढ़ाने की इच्छा है. इसके अलावा केरल जैसे राज्य में जहां कांग्रेस और वाम नीत मोर्चा  सत्तारुढ़ होता आया है, इस बार भाजपा भी अपनी उपस्थिति मजबूत करना चाहती है. ऐसे में यह देखना काफी दिलचस्प होगा की इस बार दक्षिण का मतदाता कैसा संदेश देता है. यथास्थित बरकरार रखता है या जैसा कि देश में सर्वत्र हो रहा है. भाजपा का झंडा बुलंद करता है, फिलहाल हर अोर से खेमाबंदी जारी है. हर कोई मतदाताओं को रिझाने के लिए अपने-अपने स्तर पर प्रयास कर रहा है. लोकलुभावन वादों की बौछार हो रहीं है,जैसा की दक्षिण में हमेशा होता आया है. देखते हैं इस बार वहां क्या गुल खिलता है.


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