लोकतंत्र का एक रूप यह भी

अभी असम का मतदान हुए खत्म हुए चंद दिन ही बीतें हैं और परिणाम आने में अभी भी लंबा समय है, लेकिन उसके पहले जिस तरह की हलचल असम में शुरू हो गई है, वह देश के प्रजातंत्र के लिए सही नहीं कही जा सकती। असम में कांग्रेस के सहयोगी दल एआईयूडीएफ ने अपने प्रत्याशियों को जयपुर शिफ्ट कर दिया है। अभी मतदान हुआ है, परिणाम आने में अभी 20 दिन से ज्यादा समय बाकी है, कौन जीतेगा कौन हारेगा अभी कुछ पता नहीं है, बावजूद इसके अपने  प्रत्याशियों को लेकर ऐसी असुरक्षा  का होना कि उन्हें दूसरे राज्य में स्थानांतरित किया  जाय और उन्हें निगरानी में रखा जाए। हमारे प्रजातंत्र के लिए एक दुखद संकेत है। लोग अपने उम्‍मीदवारों को लेकर कितना सशंकित हैं कि उन्हें टिकट तो दे रहे हैं, उनसे चुनाव लड़वा रहे हैं, परंतु उन पर उन्हें भरोसा नहीं है कि चुने जाने के बाद वे उनकी पार्टी के साथ रहेंगे या नहीं। संकेत साफ़ है कि उस दल की विचारधारा के प्रति उस व्यक्ति का समर्पण ही उन्हें संदिग्ध लगता है। यदि ऐसा था, तो उन्हें टिकट ही क्यों दिया गया। जब आपकी विचारधारा इतनी ही हल्की है कि उसकी नाव पर सवार होकर चुनावी वैतरणी पार करने वाल व्यक्ति कभी भी आपको छोड़ सकता है, तो इससे साफ़ है कि आपने उसे तैयार करने में वैसी मेहनत नहीं की जैसी जरूरी थी। जीतने के बाद भी उसे नहीं लगता कि आपकी पार्टी के साथ उसका भविष्य सुरक्षित है। कारण आपके पास कोई नीति   या  वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं है, जिस पर आदमी टिका रहे और उसे आपको इधर-उधर ना भेजना पड़े और निगरानी में ना रखना पड़े। इस देश में ऐसे-ऐसे लोग हुए, जिन्होंने अपनी विचारधारा के आधार पर  दलों की स्थापना की, कभी-कभी एक दो ही जीते, उन्हें खड़ा होने में लंबा समय लगा, लेकिन उन्हें कभी अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों को स्थानान्‍तरित करने या निगरानी में रखने की जरूरत नहीं पड़ी, जबकि आज मतदान के तुरंत बाद ही या बीच के समय मंे सरकार को लेकर कोई गड़बड़ होने की स्थिति में ऐसा होना आम बात हो गई है। आप जिस पार्टी से जुड़ते हो तो आप व्यक्ति से नहीं उस पार्टी के विचारधारा, देश और समाज के कल्याण के लिए उसकी योजना उसके कार्यक्रम, उसके विजन को साकार करने के लिए उसका हिस्सा बनते हो, उसके लिए आवश्यक प्रजातं‌ित्रक प्रक्रियाओं मंे भागी दरी करते हो, अपनी पार्टी की सरकार बनाने का प्रयास  करते हो और यदि उसमें सफलता मिलती है, तो उसी विजन के मुताबिक देश और  समाज के कल्याण का काम करते हो, लेकिन आजकल जिस तरह के दलों की भरमार हमारे देश के कोने कोने में हो गई है, उनका लक्ष्य किसी भी तरह सत्ता प्राप्त करना है। किसी पर इसके लिए जातिवाद का खेल खेलने तो किसी पर अगड़ा पिछड़ा का खेल खेलने का आरोप लगता है,  तो किसी पर घुसपैठ करने और उन्हें  संरक्षित करने का आरोप लगता  है,  तो किसी पर अल्‍पसंख्यक परस्ती को ही राजनीति  मान  लेने  का आरोप  लगता है।  इनके पास लोकलुभावन नारों के सिवाय कुछ नहीं है। इनके लिए इनके प्रत्याशी इनकी मिलियत है एआईयूडीएफ भी ऐसी एक पार्टी है, जिस पर घुसपैठ को लेकर गंभीर आरोप लगते रहते हैं, तो वह अपने प्रत्याशियों की निष्ठा को लेकर सशंकित हो यह समझ मंे आता है  ले‌िकन यह रोग राष्ट्रीय पार्टियों में भी लग चुका है। राजनैतिक दलों का अपने ही निर्वाचित प्रतिनिधियों को लेकर इस तरह का अविश्वास का माहौल ना तो देश के लोकतंत्र के लिए ठीक है और न ही राजनैतिक दलों के लिए। यदि हर निर्वाचित प्रतिनिधि का यही लक्ष्य हो की किसी भी तरह सत्ता में ही रहना है और उसके लिए वह कोई जोड़तोड़ करने या निष्ठा बदलने के लिए तैयार रहता है तो यह पार्टी सिस्टम को ही खतरे में  डालता है। किसी भी पार्टी से लड़ो और जीतने के बाद आपको पार्टी में रोकने के लिए उस पार्टी को मशक्कत करनी पड़े या निगरानी में रखना पड़े यह संस्कृति जो देश में विकसित हो रही है। लोकतंत्र की उदात्त परंपराओं और मान्यताओं के विपरीत है और सही नहीं है। इस पर कैसे रोक लगे इस बारे में सभी राजनीतिक दलों को सोचना होगा और समुचित सुधारात्‍मक  कदम भी उठाने होंगे।  


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