खामोशी के बीच दौड़ती रही मुंबई

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मुंबई

पिछले साल लगे लॉकडाउन की यादें शेष हैं, लेकिन अब हमारे सामने नया लॉकडाउन सिर उठाए खड़ा है। ऐसे में दोनों की तुलना लाजिमी है। हालांकि इस बार का लॉकडाउन थोड़ा रहम दिल नजर आ रहा है। मिशन ‘ब्रेक द चेन’ अभियान के तहत लगाए गए लॉकडाउन का गुरुवार को पहला दिन था। लॉकडाउन के पहले दिन मुंबई में लोकल ट्रेन समय से दौड़ रही थीं, जबकि सड़कों पर टैक्सी, ऑटों और बेस्ट बसों आम दिनों की तरह चल रही थी। फर्क सिर्फ इतना भर था कि लोकल-बसों में भीड़ कम थी, लेकिन कई जगहों पर खासी भीड़ भी उमड़ी और लोग बेवजह इधर से उधर घूमते नजर आएं, हालांकि हर तरफ खामोशी भी पसरी हुई थी। बुधवार रात 8 बजे से महाराष्ट्र में मिशन ‘ब्रेक द चेन’ शुरू हो गया है, जिसके तहत राज्यभर में धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा लगा दी गई है। यानी एक स्थान पर पांच या ज्यादा लोग इकट्‌ठा नहीं हो सकेंगे। यह नियम एक मई की सुबह 7 बजे तक जारी रहेगा।

लोकल में कम नजर आई भीड़...

उपनगरों सहित मुंबई में मेडिकल, किराना और डेरी खुली हुई थीं। अत्यावश्यक सामग्री को छोड़कर अन्य दुकानें पूरी तरह बंद थीं। रेलवे स्टेशनों पर लोग बेरोक-टोक आवाजाही कर रहे थे, जबकि पिछले लॉकडाउन में सभी रेलवे स्टेशनों में मात्र एक गेट से प्रवेश की अनुमति थी और हर जगह पुलिस तैनात थी। ट्रेनों में भीड़ कम नजर आई, लेकिन कई लोग बेवजह यात्रा करते नजर आए। चर्चगेट रेलवे स्टेशन भी भीड़ कम थी और एक- दो टीसी यात्रियों की टिकट चेक कर रहे थे। मंत्रालय के आसपास भी सन्नाटा पसरा हुआ था और चाय की दुकानें बंद नजर आई। विजिटर्स को मंत्रालय में भीतर प्रवेश की अनुमति नहीं होने से यहां भी बेहद कम लोग नजर आए। जगह-जगह पुलिस की नाकेबंदी है। शहर के एंट्री प्वाइंट दहिसर, वाशी, मुलुंड चैक नाका पर वाहनों की भारी भीड़ नजर आई।

रिक्शा चालकों की मुसीबत

लॉकडाउन लगने से रोजाना कमाकर खाने वाले रिक्शा चालक भारी मुसीबत में आ गए हैं। नालासोपारा के रिक्शा चालक सर्वेश चौबे कहते हैं कि वे पहले रोजाना 500 से 600 रुपए कमा लेते थे, लेकिन अब बड़ी मुश्किल से डेढ़ से 200 रुपए का धंधा हो पाता है। कुछ यहीं कहानी एक अन्य रिक्शा चालक विजय यादव की भी है। उनकी कमाई बेहद घट गई है। अब वे रोजाना 300 रुपए की कमा पाते हैं। इस वजह से उन्होंने अपने परिवार को गांव भेज दिया है। वे कहते हैं कि सरकार ने रिक्शा चालकों को 1500 रुपए देने की घोषणा की है, लेकिन पता नहीं यह रकम कब तक मिलेगी? दरअसल लोगों के घर से नहीं निकलने से रिक्‍शा-काली पीली टैक्सियों का धंधा चौपट हो गया है।

मजदूरों का पलायन जारी

कुर्ला के लोकमान्य तिलक टर्मिनस पर प्रवासी मजदूरों की भीड़ नजर आई। सबकी अलग-अलग दिक्कतें हैं, किसी का रोजगार छीन गया तो किसी के पास खाने की दिक्कत है। ये लोग किसी तरह अपने गांव जाना चाहते हैं। जिनके पास कंफर्म टिकट है, उसे ही स्टेशन के अंदर प्रवेश की अनुमति है। वेटिंग और साधारण टिकट वालों को परिसर से दूर जाने को कहा जाता है।  


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