ये कैसा समय

आज पूरा देश कोरोना वायरस के सामने जैसे किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा है। इतने निस्सहाय-निरुपाय हम पहले कभी नहीं थे। साल भर पहले जब इस महामारी ने हमारे देश में दस्तक दी थी, तब हमारे पास कोई तैयारी नहीं थी। इस एक वर्षमें हमने लंबी यात्रातय की है। देश तरह-तरह के प्रयोगों के दौर से गुजरा है। हमने एक के बाद एक लॉकडाउन देखे हैं, अपने बीमार पिताजी को 1,200 किलोमीटर साइकिल चलाकर बिहार ले जाने वाली किशोरी देखी है। अपने देस-गांव पैदल लौटते लाखों मजदूरों को देखा है, फिर भी हम इतने असहाय नहीं थे। हालांकि, इस बीच हमारे पास हर तरह के किट हैं, वेंटिलेटर हैं, हमारे पास वैक्सीन भी हैं, हमने वैक्सीन अपने पड़ोसियों को भी भेंट में दी है। हम वैक्सीन डिप्लोमेसी में भी अव्वल रहे। 15 करोड़अपने लोगों को वैक्सीन लग भी चुकी है, फिर भी हम निरुपाय हैं, क्योंकि महामारी की मार इतनी तेज है कि हम कुछ कर नहीं पा रहे हैं। शायद हम अपनी शुरुआती कामयाबी से कुछ ज्यादा ही फूल के कुप्पा हो गए थे। कोविड के संकट को भूलकर हमारे राजनेता एक-दूसरे को नीचा दिखाने में जुट गए। कोविड प्रोटोकॉल सिर्फ कुछ ही जिम्मेदार लोगों के अनुपालन की चीज रह गया। नेतागण धड़ल्लेसे चुनावों में कूद गए। चुनावी रैलियों में कोविड प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ने लगीं। यहां तक कि कुंभ जैसे, विशाल जनसमुद्र को आमंत्रित करने वाले आयोजन भी बिना खास तैयारी के होने लगे। सरकारों को ही क्यों दोष दें? जनता स्वयं जैसे चादर ताने सो रही थी। वैक्सीन है, लेकिन हम उसे लगवाने में कोताही बरतने लगे थे। शादी-ब्याह, उत्सव-त्यौहार उसी पुराने अंदाज में मनाने लगे थे, इसलिए जब कोरोना के बहुरूपी वायरस ने हमें सुषुप्तावस्थामें पाया, तो चौतरफा प्रहार कर दिया। एक साथ बड़ी संख्यामें पीड़ित लोग अस्पतालों की तरफ कातर निगाह से देखने लगे। व्यवस्था चरमराने लगी। नियंत्रण कमजोर पड़ने लगा। न हमारे पास पर्याप्तऑक्सीजन है, न रेम्देसिवियेर इंजेक्शन हैं, हैं भी तो कालाबाजारी करने वालों के पास, जो दूसरे महायुद्ध के दिनों की तरह एक-एक इंजेक्शन 50-50 हजार रुपये तक में बेच रहे हैं। कोरोना टेस्ट तक नहीं हो रहे। हो भी रहे हैं, तो पांच दिन तक रिपोर्ट नहीं आ रही। निजी जांच कंपनियों ने हाथ खड़े कर दिए हैं, जो जांचें हो रही हैं, वे सोलह आना भरोसे लायक नहीं हैं। अब हर रोज तीन लाख तक नए मरीज आ रहे हैं। ढाई-तीन हजार मौतें रोज हो रही हैं। आंकड़े घटने का नाम नहीं ले रहे हैं। यहां तक आशंका व्यक्त की जा रही है किअभी इसका चरम बाकी है। चारों तरफ अव्यवस्थाका आलम है। लोग अस्पताल जाने से घबरा रहे हैं। ये कैसे समय में जी रहे हैं हम? जाहिर है, ऐसी स्थितिमें सर्वोच्च अदालत मूक दर्शक बनी नहीं रह सकती। यदि वह सरकार से आगे का रोडमैप मांग रही है, तो गलत नहीं कर रही। व्यवस्थाको कसने के लिए अदालतों को न केवल कड़ाई करनी चाहिए, बल्कि कोरोना के खिलाफ युद्ध को वैचारिक रूप से भी बल देना चाहिए। अभी पूरा ध्यान जमीनी स्तर पर सुविधाओं को बहाल करने पर होना चाहिए। जितनी जल्दी हम सुविधाओं को बहाल करेंगे, उतना ही अच्छा होगा। यह वक्त भरोसे को कायम रखने का है और जब अदालतें दोटूक बात करती हैं, तब लोगों का मनोबल बढ़ता है। अस्पतालों और वहां जीवन रक्षासे जुड़े संसाधनों की कमी की जो तस्वीर उभर कर सामने आई है, वह इस त्रासदी को कई गुना बढ़ाने वाली है। सवाल है कि हालात यहां तक कैसे और क्यों पहुंचे! महामारी की घोषणा के बाद से ही इसके विषाणुओं के संक्रमण और इसके इलाज के संबंध में जिस तरह की जटिलता देखी गई, उसमें विशेषज्ञोंकी ओर से यह साफ बताया गया कि जब तक इसकी रोकथाम के लिए कारगर टीका सामने नहीं आ जाता है, तब तक इससे बचाव ही सबसे बेहतर उपाय है। बचाव के साधनों में मुंह और नाक को ढकने के लिए मास्क लगाने और समय-समय पर हाथ धोने को सबसे उपयोगी उपाय के तौर पर देखा गया। इसके प्रतिलोगों को जागरूक करने के लिए सरकार ने अपनी ओर से हर स्तर पर कोशिशें कीं और काफी हद तक इसमें कामयाबी भी मिली। विडंबना यह है कि इस सलाह पर अमल करने वाले तमाम लोगों के समांतर वैसे भी लापरवाह लोग रहे, जिन्होंने इन उपायों पर गौर करना जरूरी नहीं समझा। कई लोगों ने जहां आधे-अधूरे ढंग से मास्क लगाने की औपचारिकता निभाई तो बहुतों ने बिल्कुल ही मास्क नहीं लगाया और घर से बाहर काम से या बिना काम के इधर-उधर घूमते रहे। जबकि इस बीच कोरोना विषाणु के नए जटिल प्रकार ने अपने पांव पसारना जारी रखा। अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोगों की लापरवाही के बीच विषाणुओं को फैलने में कितनी मदद मिली होगी। नतीजा यह है कि इससे संक्रमितों और मरने वालों की संख्या समूचे देश के सामने एक बड़ी चुनौती बन गई है। जबकि घर से बाहर निकलने पर सिर्फ मास्क लगाने जैसी छोटी सावधानी बरत कर इसकी रोकथाम में एक बड़ी भूमिका निभाई जा सकती थी। आज हालत यह हो गई है कि संक्रमण से लगातार बिगड़ते हालात के मद्देनजर सरकार को यह कहना पड़ गया कि अब ऐसा वक्त आ गया है जब लोग अपने घरों के भीतर भी मास्क पहनना शुरू कर दें। नीति आयोग के एक सदस्यके मुताबिक अगर घर के अंदर एक भी कोविड पॉजिटिव व्यक्ति मौजूद है, तो उसका मास्क पहनना जरूरी है, ताकि परिवार के दूसरे सदस्यों को संक्रमित होने से बचाया जा सके। दरअसल, कोरोना विषाणु के संक्रमण का जो स्वरूप रहा है, उसके बारे में शुरुआत से ही यह बताया गया कि किसी संक्रमित के खांसने-छींकने, बात करने, चिल्लाने से मुंह के जरिए निकली सूक्ष्म बूंदों से इसके संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है। इसे सिर्फ तभी रोका जा सकता है जब एक जगह बैठे दो या इससे ज्यादा लोग मुंह और नाक को ढकने वाले मास्क लगाए रहें। भले वह जगह घर या घर का दायरा ही क्यों न हो! इस उपाय को फिलहाल अपने रोजमर्राके सलीके में शामिल करना वक्तकी जरूरत है, क्योंकि टीकाकरण अभियान के बावजूद यह देखा जा रहा है कि संक्रमण की रफ्तार में कमी नहीं आ पा रही है। इसका मतलब यह है कि विषाणु अपने पुराने या नए स्वरूप में काफी जटिल है और इससे बचाव के लिए इसके रास्तेमें दीवार खड़ा करना ही सबसे कारगर उपाय है। 

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