यह कैसी विडंबना

कोरोना महामारी के देशव्यापी तांडव के मध्य हमारे देश में जिस तरह का विरोधाभास देखने को मिला रहा है, वह स्तब्ध करने वाला है। हमारे यहां जहां एक ओर आॅक्सीजन की कमी को लेकर हाहाकार मचा है। इसकी कमी से कोरोना संक्रमित दम तोड़ रहे हैं, तो दूसरी ओर नासिक जैसे हृदय विदारक हादसे भी सामने आ रहे हैं, जहां इसका रिसाव 22 लोग की जान जाने का कारक बना गया। ऐसी घोर लापरवाही गहन छानबीन और सख्त कारवाई की मांग कर रही है। ऐसी लापरवाही जिसके चलते एक ऐसी जीवन के लिए निहायत आवश्यक वस्तु जिसकी मांग को लेकर पूरे देश में निहायत पीड़ादायक तस्वीर के दर्शन हो रहे हैं। वह बर्बाद हो रही है और लोगों की जान ले रही है। आपदा या महामारी पर किसी के वश नहीं है, लेकिन जिस तरह के प्रशासनिक पंगुता के दर्शन हमारे देश के कई राज्यों में हो रहा है और ऐसा लग रहा है कि उन्हें इससे कैसे निपटें इस बारे में कुछ पता ही नहीं है उन्हें उत्तर प्रदेश और बिहार सरकारों से सबक लेना चाहिए। कम से कम उन्होंने ऐसा इंतजाम  किया है कि वहां इतनी अराजक और भ्रामक अवस्था के दर्शन नहीं हो रहे हैं। यदि तथाकथित बीमारू राज्य ऐसा कर सकते हैं, तो अब तक देश में अपने आपको को प्रगति का इंजन मानने वाले राज्यों में इतनी हाए तोबा क्यों मची हुई है। अभी राजनीतिक रोटियां सेंकने का वक्त नहीं है, लेकिन दुर्भाग्य से अधिकांश देश में यही हो रहा है। ऐसे लोंगों को अपनी नजरें एक बार अस्पतालों की बदहाली और जीवनावश्यक वस्तुओं की कमी और अपने परिजनों के इलाज के लिए चीत्कार करते लोगों की और भी डाल लेना चाहिए। तब शायद इनकी आंख खुलेगी और ओछी राजनीति से दूर होकर वह कर सकेंगे, जिसके लिए इन्हें जनता ने चुना है। लापरवाही चाहे आम जन की हो या जनता की वह भी महामारी के संकट काल में किसी भी तरह से क्षमा का पात्र नहीं है। इस पर सख्त कार्रवाई हो, ऐसे विरोधाभास काफी त्रासद है। इनकी पुनरावृत्ति न हो।


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