जिला पंचायत सदस्यों की दूसरी सूची पर भाजपा में मंथन

लखनऊ

उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव शुरू होते ही प्रदेश में सियासी सरगर्मी बढ़ गई है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष, संगठन मंत्री और पंचायत चुनाव प्रभारी की मौजूदगी में होने वाली बैठक में एक बार फिर प्रत्याशियों के नामों पर फाइनल फैसला लिया जा सकता है। जिन जिलों में दूसरे चरण के चुनाव हैं उनमें मुजफ्फरनगर, बागपत, गौतमबुद्ध नगर, बिजनौर, अमरोहा, बदायूं, एटा, मैनपुरी,कन्नौज, इटावा, ललितपुर, चित्रकूट, प्रतापगढ़, लखनऊ, लखीमपुर खीरी, सुल्तानपुर, गोंडा, महराजगंज,वाराणसी, आजमगढ़ शामिल हैं, लेकिन सभी की नजर गोंडा पर लगी है। इसका कारण है सरकार किसी भी दल की रही हो यहां 1995 से हुए अध्यक्ष पद के चुनाव में सांसद कैसरगंज का ही दबदबा चलता रहा है। 1995 में जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर सीमा पांडेय ने जीत हासिल की थी। उस समय उनके पति डॉ. विनय कुमार पांडेय प्रदेश सरकार में कारागार राज्यमंत्री थे, लेकिन वर्ष 1997 में जिले का बंटवारा हो गया और बलरामपुर जनपद अलग बन गया। इसके बाद पहला चुनाव वर्ष 2000 में हुआ। उस समय जिपं अध्यक्ष की सीट अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित हो गई थी। इसमें सांसद बृजभूषण शरण सिंह के करीबी बृजकिशोर को प्रत्याशी बनाया गया और वह विजयी रहे थे। बृजकिशोर चार साल तक अध्यक्ष रहे। उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे।  उनके इस्तीफा देने के बाद प्रशासक की नियुक्ति हुईं और 2005 में जिला पंचायत अध्यक्ष अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गया। इस सीट पर सांसद बृजभूषण के करीब बलरामपुर के विधायक पल्टूराम की पत्नी ज्ञानमती को लड़ाया गया। लेकिन प्रदेश में सपा की सरकार थी और सपा से आज्ञाराम चुनाव लड़े, लेकिन सांसद बृजभूषण के सटीक पैंतरे के आगे सपा को पटकनी देते हुए ज्ञानमती ने बाजी मार ली।


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