सही और समयोचित निर्णय

प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा हरिद्वार में चल रहे कुम्भ को लेकर साधु संतों की हाल चाल लेने के लिए आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गि​िर से बात चीत और यह सुझाव कि दो शाही स्नान हो चुके हैं अब आगे प्रतीकात्मक हों, सही और समयोचित सलाह  साबित हुई है। प्रधानमंत्री का सुझाव मान कर महामंडलेश्वर द्वारा संतो से सलाह मशविरा कर कुम्भ के समापन की घोषणा एक अभिनंदनीय कदम है। जिस तरह कई दर्जन संत इसकी यानी महामारी की चपेट चुके हैं और दो अखाड़ों ने कुम्भ समाप्ति की घोषणा कर दी थी, साथ ही जिस तरह वहां संक्रमितों की संख्या में इजाफा हो रहा है। उसके मद्देनजर जरूरी हो रहा है कि इस बारे में कुछ किया जाए। कारण इस समय सबसे बड़ी प्राथमिकता महामारी के कहर को नियंत्रित करना और रोकना है, जिससे महामारी का कहर न बढ़े। 

यह राहत की बात है कि संत समाज ने प्रधानमंत्री के सुझाव पर सकारात्मक कदम उठाते हुए कुम्भ की समापन की घोषणा की। जिस तरह देश के कई राज्यों में कोरोना अपना कहर बरपा रहा है। उसके चलते यह चिंता पहले से ही थी कि कुम्भ के आयोजन जिसमें लोगों का इकट्ठा होना स्वाभाविक है में संक्रमण बढ़ सकता है अब जबकि यथार्थ में वह होता दिख रहा है, तो कुछ कदम उठाना जरूरी हो गया था। प्रधानमंत्री की पहल के बाद और उसे संत समाज द्वारा मिल रहे प्रतिसाद को देखते हुए ऐसा लगने लगा था कि कुछ ना कुछ कदम ऐसा उठाया जाएगा, जिससे कुम्भ की परम्परा भी अक्षुण्ण रहेगी और लोग महामारी के चपेट में भी आने से बचेंगे। पहले से ही इस पर कोई मार्ग निकालने के लिए उत्तराखंड सरकार और भाजपा नेताओं द्वारा संत समाज से इस दिशा में चर्चा शुरू रखने का संकेत मिला था, जिसे सकारात्मक माहौल बन रहा था। अब प्रधानमंत्री की पहल के बाद इस दिशा में फैसला हो गया। यह वक्त की मांग है उन हर कार्यों से बचा जाय, जिससे महामारी को पांव पसारने का मौका मिल सकता है और लोगों का जीवन खतरे में पड़ सकता है।

एकजुटता के साथ सामना करने का समय

कोरोना कहर के चलते देश में नित नए कीर्तिमान बनाती संक्रमितों और मौतों की संख्या और इसमें ऑक्सीजन और आवश्‍यक दवाओं को लेकर मची देश व्यापी त्राहि त्राहि कई सवालों का जवाब मांगती है और हमारी अब तक की तैयारियों और अनुमानों पर भी सवाल खड़ा करती है। माना कि महामारी के इस देश व्यापी तांडव में लोग की निश्चिंतता और लापरवाही का बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन केंद्र और राज्य प्रशासन इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकता कि उसकी ओर से भी ढिलाई हुई और वांछित एहतियाती कदम उस समय नहीं उठाये गये जब दूसरे लहर ने अपना मारक असर दिखना शुरू कर दिया था। उस समय वांछित सावधानियां नहीं बरती गयी और वह भी पहली लहर के धीमे पड़ने के बाद और वैक्सीनेशन शुरू होने के बाद सुस्त हो गया। परिणामस्वरूप आज देश पुन: महामारी की राष्ट्रीय आपदा से दो चार हो रहा है और इस पर विडंबना यह है कि अभी भी राजनीति हो रही है। राज्य और केंद्र अभी भी एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रही है। इस तरह के बचकाने आरोप लग रहे हैं कि राज्य विशेष को जीवनावश्यक दवाइयों की आपूर्ति भी रोकी गयी है। यह ओछेपन की पराकाष्ठा है। आवश्यक है कि ऐसे लज्जास्पद प्रदर्शन जहां भी हो रहे  हैं, वे तुरंत बंद हों और सबका ध्यान पूरी तरह से वह हर साजो समान उपलब्ध कराने में हो, जिससे लोगों का बहुमूल्य जीवन बचाया जा सके। दवाइयों की कमी की, बेडों की कमी की, ऑक्सीजन की कमी की जिस तरह की हृदय विदारक तस्वीरें समाने आ रही है वह बहुत दुखद और त्रासद है यह राजनीति का समय नहीं है, बल्कि एकजुटता के साथ सामना करने का समय है।


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