कांग्रेस को ऑक्सीजन की जरूरत

पांच राज्यों के चुनाव परिणाम समाने हैं। भाजपा असम में अपनी  सरकार बरकरार रखने में कामयाब है । पुडुचेरी में भी उसका गठबंधन विजय पथ पर है ,बंगाल में भले ही वह सत्ता के शिखर पर पहुंचने में नाकाम रही, लेकिन पिछले विधान सभा की तीन सीटों की तुलना में इस बार 85 -90 तक पहुंचना कोई छोटी मोटी उपलब्धि नहीं है। यह एक बहुत बड़ी छलांग है,  तमिलनाडु और केरल में उसकी स्थिति अपेक्षा के अनुरूप ही है। इन दोनों जगहों पर भाजपा अभी अपना संगठनिक ढ़ांचा मजबूत करने और जनाधार बढ़ाने की कवायद में लगी है, जो मजबूत हो रहा है यह इन चुनाव के परिणाम दर्शा रहे हैं। तगड़ी चुनौती के बाद भी ममता बनर्जी का अपना गढ़ बचने में कामयाब होना उनकी भी बड़ी सफलता है। इधर जिस तरह देश भर से विपक्षी नेताओं की बधाई और शुभकामना उन्हें मिल रही है, उससे लगता है कि आगे वे राष्ट्रीय पटल पर भी अपनी मजबूत उपस्थिति का एहसास करा सकती हैं। फिलहाल उनकी असली चुनौती अपने आपको को एक उदार और जिम्मेदार नेता के रूप साबित करने की होगी।  उन्हें कोरोना की जंग जीतने की साथ - साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बंगाल में शांति रहे। राजनीतिक या किसी कारणों से हिंसा को बढ़ावा ना मिले और दूसरे दलों के कार्यकर्ता भी उसी राज्य की नागरिक हैं, उन्हें उसी तरह का ट्रीटमेंट मिले और उनका उत्पीड़न न हो, जिसकी आशंका उनकी विजय के संकेत  के साथ ही व्यक्त होने शुरू हो गए हैं।

 हिंसा जो पश्चिम बंगाल की राजनीति का स्थाई भाव जैसा बना गया है, वह बदले यह उन्हें सुनिश्चित करना होगा और राज्य के हर नागरिक को अपना मान कर विकास का नया पर्व शुरू करना होगा। हिंसा की मनोवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है या प्रतिशोध की भावना से काम हो रहा है ,ऐसा सन्देश जाना ना उनकी छवि के लिए ठीक होगा और ना ही राज्य के लिए। तमिलनाडु में डीएमके की विजय अपेक्षित थी। किसी करिश्माई नेता के अभाव में स्वर्गीय जयललिता की पार्टी ने भी खराब प्रदर्शन नहीं किया है।  हां केरल ने जरूर चौंकाया है। कांग्रेस के युवराज की राज्य में सक्रियता के बाद भी पार्टी वाम मोर्चा के सत्ता से दूर करने में नाकाम रही है और पुडुचेरी भी गंवा रही है। असम में भी ठनठन गोपाल वाली स्थति कांग्रेस के हाथ लगी है। बंगाल में उसने भाजपा के द्वैष में कुछ किया ही नहीं तो भले ही आज वह यह आनन्द मनायें की बंगाल व तमिलनाडु में भाजपा को कोई ख़ास सफलता नहीं  मिली है। इस चुनाव का यदि को सबसे बड़ा लूजर है तो वह कांग्रेस है। वाम दल भी यदि बंगाल में साफ़ हुए हैं तो केरल का अपना किला बचाने कामयाब रहे हैं, जबकि कांग्रेस के खाते में कुछ आया है, ऐसा नहीं लगता है। आज उसकी स्थिति यह है कि वह मीडिया के सवालों का सामना नहीं कर सकती, इसलिए उसके प्रवक्ताओं ने कोरोना की आड़ लेकर परिणाम के दिन होने वाले बहसों  से भी किनारा कर लिया है। यह सब इसलिए हो रहा है, कारण कांग्रेस अपनी सोच सही करने, अपना घर सही करने, अपना संगठन मजबूत करने,अपनी विचारधारा को धार देने  ,उसमे आयी मरगल दूर करने की कोशिश करने को छोड़ कर सिर्फ इस ध्येय से काम कर रही है कि हमारा घर जल जाए तो कोई बात नहीं, पड़ोसी का घर जरूर जलना चाहिए। शुरू से ही उसकी सबसे बड़ी कमी भाजपा द्वैष में समविचारी दलों को राज्यों में पनपाना है। इसमें वे तो मजबूत हो रहे हैं, लेकिन कांग्रेस एक- एक कर सभी राज्यों से हवा हो रही है। अब तो यह समस्या और बढ़ने वाली है। अभी तक यूपीए अध्यक्ष पद को लेकर रांकपा ही दबाव बना रही थी, अब तो ममता के रूप में एक नया नेता सामने है। यही नहीं राहुल गांधी की अगुवाई में यह विफलता जी -23 के नेताओं को और मुखर कर सकती है,जो राहुल गांधी के ताजपोशी के प्रयासों को और दूर कर सकता है या उस पर प्रश्नचिन्ह लगा सकता है। कांग्रेस की अवस्था उतरोत्तर उस दीपक की तरह है, जिसमें तेल बहुत कम बचा है और मालिक उसमे तेल डालने की बजाय उसे टिमटिमाता देख रहा है। कांग्रेस को अब अपने अस्तित्व के दीपक को जलाये रखने के लिए  तेल डालने की जरूरत है जो ना होकर दूसरे का घर जलता देखने के लिए उसे बुझने दिया जा रहा है। देखना यह है कि इस पर काबू मिलता है कि अंततः दीपक बुझ ही जाता है। अभी के सूरते हाल काबू वाले नहीं दिखते। कांग्रेस को आॅक्सीजन की जरूरत है।


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