बंगाल और हिंसा

बंगाल की राजनीति और हिंसा का चोली दामन का साथ रहा है. ममता दीदी के पहले वामदलों के शासन काल में यह बात उठती रही है. फर्क है तो सिर्फ यह की उस समय आरोप लगाने वाले और गुहार लगाने वाली दोनों ममता दीदी थी, अब जब गुहार लग रही है तो ममता दीदी मुख्यमंत्री है तो राजनीतिक पकड़ मजबूत बनाये रखने का यह हिंसा का तरीका बंगाल के लिए नया नहीं है, हां उसकी  विद्रूपता में जरूर वृद्धि हुई है. माहोल कितना कठिन है लोग किस तरह की हिंसा का सामना कर रहे हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की लोग अपना घरबार छोड़ पलायन कर रहे हैं. एक पशु को भी यदि अपने खूंटे से अलग बांधते हैं तो वह जमीन आसमान एक कर देता है तो यदि विधाता की सर्वोत्कृष्ट कृति मनुष्य अपना घरबार छोड़कर पलायन कर रहा है, तो इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है की उसके ऊपर संकट कितना बड़ा है. यह अनायास ही नहीं है, ऐसी बदतर हालत से बंगाल को निजात दिलाने के लिए राष्ट्रपति भवन तक गुहार लगाई जा रही है और देश के सर्वोच्च न्यायालय तक का द्वार खटखटाया जा रहा है. राज्यपाल रोज इस पर सवाल खड़ा कर रहे हैं यह हालत 90 के उस मंजर की याद दिलाता है जब रातों-रात जम्मू-कश्मिर से एक बड़ी तादाद में पंडित अपना घर-बार छोड़कर अपने ही देश में शरणार्थी बनने के लिए बाध्य हुए थे और तब से लेकर आज तक ना जाने कितनी सरकारें वहां और केंद्र में बनीं, लेकिन उन्हें वहां वापस अभी तक नहीं बसाया जा सका और अभी कितना वक्त और लगेगा कहा नहीं जा सकता. कहीं से उजाड़ना और उसके बाद कहीं दूसरे जगह बस कर वापस फिर अपनी जगह आना आसान नहीं होता और इस पूरी प्रक्रिया में निर्दोष मानवता कितनी लहूलुहान होती है, उसका कितना बड़ा नुकसान होता है, इसका आकलन मुश्किल है. इस स्तर पर हिंसा होना और हालत इतने  खराब होना की लोग सदियों का अपना आशियाना छोड़कर जान बचाने के लिए पलायन करने को मजबूर हों एक ऐसी दुखद स्थिति है जिसका इलाज त्वरित गति से देश के शासन के तीनों अंगों को ढूढ़ना होगा. कारण न्याय की गुहार, सुरक्षा की गुहार राहत की गुहार हर दर पर लगाई जा रही है. वह हर कुछ करना होगा, जिसे यह सूरते हाल बदलें और जो लोग अपना घर छोड़कर भागने पर मजबूर किये गये हैं वे वापस अपने मकान पर आयें, और वहां वह अपने आपको महफूज महसूस करें इसकी पूरी और पुख्ता व्यवस्था हो. साथ ही इस तरह की चीजें जो कहीं ना कहीं देश में समय-समय पर सुनाई पड़ती हैं उनकी पुनरावृत्ति ना हो इसके भी पुख्ता इंजाजाम किये जाएं. ममता दीदी आपके राज्य में आपकी शानदार विजय के बाद जिस तरह की हिंसा हुई है वह आपकी विजय पर कालिख के समान है, आपको तुरंत वह हर कदम उठाना चाहिए जिससे भयाक्रांत नागरिकों को सुरक्षा का एहसास हो, क्योंकि आप उस राज्य  की शासन प्रमुख हैं और शासन प्रमुख किसी पार्टी का नहीं, बल्कि समग्र राज्य का होता है. कारण जिस तरह की आग वहां लगी है और जिस तरह के संकेत वहां से देश भर में जा रहे हैं वह देश की समरसता के लिहाज से   किसी भी तरह सही नहीं कहे जा सकते  लाब्मे समय में वह आप और आपकी पार्टी के लिए भी ठीक नहीं होंगे यह भी तय है इस पर पूरा विपक्ष जिस तरह मौन है और तमाशबीन बना हुआ है, इसे उसे भी कोई फायदा मिलेगा ऐसा नहीं लगता. किसी दल विशेष की सफलता से या उसके समर्थक से इतना भी द्वेष सही नहीं की मानवता शर्मसार होती रहे, निर्दोश लोग मारे जाएं और आप तमाशा देखती रहें. ऐसा सोच और मानसिकता वालों का अंत में क्या हाल होता है इससे इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं. ममता और देश का विपक्ष दोनों अपना जमीर जगाये और बंगाल में जो कुछ नकारात्‍मक हो रहा है उस पर अविलम्ब विराम लगाये. यही बंगला के हिते में है और ममता बनर्जी के भी.


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