मानवीय समस्या

प्रसिद्ध कन्नड़ उपन्यासकार स्वर्गीय यू आर अनंतमूर्ति के बहुचर्चित उपन्यास संस्कार की कहानी प्लेग की महामारी के दौरान मरे एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार की दुविधा से शुरू होती है। 19वीं सदी के अंतिम दशक और 20वीं सदी के पहले दो दशकों में भारत में प्लेग का संक्रमण हुआ था। उस उपन्यास में महामारी की भयावहता और उसके जो सामाजिक, धार्मिक, निजी आयाम हमें देखने को मिलते हैं, किसने सोचा होगा कि उससे कई गुना बडे़ आकार में ये 21वीं सदी में देखने को मिलेंगे। पिछले कई दिनों से गंगा व कर्मनाशा नदियों में सैकड़ों की तादाद में शवों को बहा देने की खबरें आ ही रही हैं कि अब उन्नाव में गंगा के किनारे रेत में बड़ी संख्या में शवों को दफ्नाए जाने की विचलित करने वाली तस्वीरें और खबरें आ रही हैं। ऐसा लग रहा है कि शवों का बाकायदा दहन न कर सकने की वजह से लोग उन्हें रेत में गाड़कर चले जा रहे हैं। तस्वीरें देखकर लगता है कि उथली रेत में दफ्नाए गए शवों की संख्या काफी बड़ी है। सरकार ने इस बात की जांच के आदेश दिए हैं और इस पर कार्रवाई जरूर होगी, लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह कोई कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि मानवीय समस्या है और इसका इलाज भी मानवीय आधार पर ही किया जाना चाहिए।

शायद कोई भी ऐसा नहीं चाहेगा कि उसके आत्मीय का अंतिम संस्कार गरिमा और रीति-रिवाज के साथ न हो। लेकिन पिछले दिनों ऐसी खबरें बहुत आई हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार के गांवों तक में कोरोना संक्रमण तेजी से फैल गया है। जब शहरों, कस्बों तक में जांच व इलाज को लेकर मारामारी है, तब गांव में तो इन बातों की उम्मीद करना ही बेकार है। जो लोग कोरोना से मर रहे हैं, उनमें से ज्यादातर की मौत सरकारी आंकड़ों में दर्ज ही नहीं हो रही है। अगर कोरोना से उतने ही मरीज मर रहे होते, जितने सरकारी आंकड़ों में दर्ज हैं, तो श्मशानों, कब्रिस्तानों में ऐसी अफरा-तफरी की नौबत आनी ही नहीं चाहिए थी। उत्तर प्रदेश सरकार में कोरोना से मरने वालों के अंतिम संस्कार के लिए आर्थिक सहायता देने का वादा किया है, लेकिन अगर किसी की कोरोना जांच ही नहीं हुई, तो उसे कोरोना मरीज कैसे मान लिया जाएगा? ऐसे में, इस सहायता का फायदा शायद ही किसी को मिले। साफ है, अगर लोग शवों को रेत में दफ्ना रहे हैं या नदी में बहा रहे हैं, तो इसका मतलब है कि वे अंतिम संस्कार कर पाने में असमर्थ हैं। इसकी कई वजहें हो सकती हैं। श्मशानों में जगह नहीं है, लकड़ियां नहीं है, अंतिम संस्कार का खर्च इतना बढ़ गया है कि मरीज के इलाज में पहले ही लुट चुके लोग उस भार को भी उठा सकने में असमर्थ हैं। फिर इन दिनों गरमी भी बढ़ गई है, ऐसे में मृत देह को रखकर ज्यादा वक्त तक इंतजार भी नहीं किया जा सकता। इन शवों की वजह से कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं, बल्कि हो रही हैं। चील-कौए और कुत्ते इन शवों को नोच रहे हैं। जो शव उथली रेत में दफ्न किए गए हैं, वे बारिश में बहकर नदी में पहुंच सकते हैं और इनके सड़ने से कई बीमारियां फैल सकती हैं। लेकिन सबके ऊपर यह मानवीय समस्या है। यह हमारे समाज और प्रशासन के लिए कलंक है। हम इतने बदहाल तो नहीं हुए हैं कि अपने मृतकों को सम्मान के साथ आखिरी विदा न दे सकें। यह हमारी मानवीय गरिमा का सवाल है।

 

Post a Comment

[blogger]

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget