विपक्ष का काम सिर्फ कमियां निकालना ही नहीं

लोकतंत्र में विपक्ष की अवधारणा सिर्फ कमियां निकालने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उसकी एक सकारात्मक भूमिका भी है वह सरकार के दैनिक क्रिया-कलापों पर पर नजर रखता है। उसकी नीतियों में यदि कमियां हैं और उससे जनता का अपेक्षित या लक्षित हित नहीं साध रहा है तो उसे सरकार के सामने लाना और यदि सरकार उसे नहीं सुनती है तो उसे जनता के सामने उजागर करना. अपनी भूमिका को स्पष्ट और आक्रामक तरीके से रखना बुरा नहीं है, यही नहीं ऐसा करते समय आपको बेहतर बताने की कोशिश बुरी नहीं है। कारण यदि ऐसा नहीं कहा जाएगा तो उन्हें फिर मौक़ा कैसे मिलेगा. कोई दल अनंत काल तक विपक्ष में बैठने के लिए राजनीति में नहीं आता, सबका ध्येय सत्ता है, लेकिन उसके लिए कोई भी कुछ भी करे, यह सही नही है. विपक्ष को और सत्ता पक्ष यह ध्यान रखना होता है कि उसके विरोध या बयानों से सामाजिक समरसता.. देश की दुनिया में छवि, देश के पुरातन मान्यताओं और परम्पराओं का नुकसान ना हो, कोई भी बड़ी उपलब्धि आसानी से नहीं मिलती, उसके लिए सही तरीके से मेहनत करने की जरूरत होती है. सत्ता पक्ष चाह कर भी विपक्ष को खत्म नहीं कर सकता और ना ही विपक्ष सत्ता पक्ष को बदनाम कर, उल्‍टा सीधा बोलकर उसे सताच्युत कर सकता है. वह काम और अधिकार सिर्फ जनता जनार्दन के पास है, तो चाहे टूलकिट प्रकरण हो या जो कुछ बंगाल में चुनाव काल में हुआ या आज हो रहा है यह राजनीति की स्वस्थ परम्‍पराओं के अनुकूल नहीं है और इस पर तुरंत विराम लगना चाहिए. इससे सिर्फ और सिर्फ देश के उसके राजनीतिक दलों की गलत तस्वीर दुनिया में पेश हो रही है और बड़े मुद्दे यानी महामारी से लड़ाई को केंद्र हटाकर अलग ले जा रही है. भारत की दुनिया में गलत छवि बना देने से या कुम्भ के आयोजन पर टिप्पणी करने से यदि किसी दल को लगता है कि उसके हाथों देश के सत्ता की चाभी आ जयेगी भयानक मुगालते में है. यदि ऐसा होता तो देश में ऐसा प्रयास तथाकथित अल्‍पसंख्यक वाद, जातिवाद और अगड़ा पिछड़ा वाद के चैम्पियनों द्वारा आज तक कई बार किया जा चुका है, उसके बाद भी भाजपा का कुछ नहीं हुआ। उलटा उसका चंदोवा बढ़ता ही जा रहा है. बंगाल में कांग्रेस और वामदल ने यह तय कर लिया की घर स्वाहा हो जाएगा चलेगा भाजपा की सत्ता नहीं आनि चाहिए, वही हुआ लेकिन बावजूद भाजपा जहां गिनती की सीटें पाती थी आज बंगाल की सशक्त ताकत बन गयी. माकपा और कांग्रेस का यह सूरते हाल भी उन्हें अपनी रीति नीयत बदलने नहीं दे रहा है और इसी राह पर पूरा विपक्षी कुनबा चलता दिखाई दे रहा है. जिसमें सपा, बसपा, जदयू आदि सब शामिल हैं. ये कभी चीन के नाम पर सरकार को घेरते हैं तो कभी वैक्सीन सही नहीं है इसकी अफवाह उड़ाते हैं, कभी वैक्सीन नहीं मिल रही है इसके लिए हल्‍ला मचाते हैं, कभी कुम्भ के आयोजन को लेकर टिप्पणी करते हैं  इन्हें लगता है की सिर्फ सरकार के कमी गिनाने से इनकी राजनीतिक दुकान चमक उठेगी तो ऐसा नहीं है, इन्हें लगातार चुनाव दर चुनाव पिटाई के बाद भी यह समझ आ रही इसका मतलब साफ़ है की यह अपने आपको उठाना नहीं चाहते यह इनके पुराने जातिवादी, अल्‍पसंख्‍यक परस्‍ती वाले अगड़ा-पिछड़ा वाले एजेंडे भाजपा के सामने कुंद पड़ जाने के बाद इनकी समझ में नहीं आ रहा है की क्या करें की दोबारा जन समर्थन हासिल हो. विपक्ष के रूप में कुछ करते रहना है इसलिए कुछ भी बोल रहे हैं. यदि इन्हें लगता है की इसी से इनका भला होगा तो फिर इनका भगवान ही मालिक है. भाजपा ने 2014 से लेकर अब तक के कालखंड में शासन से अपनी राजनीति से देश के राजनीति का एजेंडा बदल दिया है, यह उनकी समझ में नहीं आ रहा है इनकी रीति नीति कालबाह्य हो चुकी है तो इन्हें उसे नए समय की मांग के अनुसार अपेक्षाओं के अनुसार ढालना होगा, तब तो बनेगी नहीं तो सिर्फ़ कमियां निकालने की प्रवृत्ति इन्हें कहीं का छोड़ेगी इसमें बड़ा संदेह है. यह इनकी जितनी जल्दी समझ में आये अच्छा है, नहीं तो सूपड़ा रोज साफ़ हो रहा है.


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