महामारी घोषित करना ही पर्याप्त नहीं

कोरोना वायरस से उपजी महामारी कोविड से जूझ रहे देश के सामने ब्लैक फंगस यानी म्यूकोरमाइकोसिस नामक बीमारी ने किस तरह एक नई समस्या खड़ी कर दी है, इसका प्रमाण है एक के बाद एक राज्यों की ओर से उसे महामारी घोषित किया जाना। ब्लैक फंगस को केवल महामारी घोषित करना ही पर्याप्त नहीं, क्योंकि आवश्यकता ऐसे उपाय करने की भी है कि कैसे लोग इस बीमारी की चपेट में आने से बचे रहें और यदि दुर्भाग्य से आ भी जाएं तो उनका समय रहते सही उपचार हो सके। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अभी तक करीब सवा सौ कोरोना मरीज ब्लैक फंगस की चपेट में आकर जान गंवा चुके हैं और कई की आंखों की रोशनी चली गई है। इनमें से कई ऐसे भी हैं, जो कोरोना संक्रमण से उबर चुके थे। यह ठीक है कि ब्लैक फंगस को महामारी घोषित किए जाने से एक तो सभी मरीजों का विवरण भारत सरकार के पास उपलब्ध रहेगा और दूसरे, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी आइसीएमआर के दिशानिर्देशों के हिसाब से इलाज हो सकेगा, लेकिन इसी के साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि किन कारणों से महामारी का रूप धारण कर चुकी यह बीमारी सिर उठा रही है? इन कारणों से न केवल आमa लोगों को अवगत कराया जाना चाहिए, बल्कि चिकित्सक समुदाय को भी। जागरूकता बढ़ाने की जरूरत इसलिए अधिक है, क्योंकि कोरोना गांवों तक फैल गया है।  नि:संदेह इसके कारणों की तह तक भी जाना होगा कि ब्लैक फंगस ने भारत में ही इतना कहर क्यों मचाया है? हालांकि यह बीमारी ऐसे कोरोना मरीजों को अपनी चपेट में लेती है, जो मधुमेग रोगी होते हैं और भारत में सबसे अधिक मुधमेह रोगी हैं, लेकिन एक अन्य कारण कोविड के उपचार के दौरान कुछ दवाओं का अनियंत्रित इस्तेमाल भी है। कम से कम अब तो यह सुनिश्चित किया जाए कि चिकित्सक इससे भली तरह अवगत हो जाएं कि कोविड उपचार के दौरान किन दवाओं के इस्तेमाल में बहुत सावधानी बरतनी है? कोरोना मरीजों की जान तो बचानी ही है, लेकिन इस कोशिश में उपचार के दौरान या फिर उसके बाद ऐसी कोई गफलत न होने पाए कि मरीज ब्लैक फंगस की चपेट में आ जाए। यह अच्छा है कि ब्लैक फंगस के उपचार में कारगर दवा की तंगी को देखते हुए कुछ और कंपनियों को उसका उत्पादन करने की मंजूरी दे दी गई है, लेकिन इसी के साथ यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि देश के विभिन्न हिस्सों में यह दवा यथाशीघ्र उपलब्ध भी हो। वास्तव में बात तब बनेगी, जब दवा के उत्पादन के साथ उसकी आपूíत पर भी प्राथमिकता के आधार पर ध्यान दिया जाएगा। केंद्र सरकार ने राज्यों से कहा है कि ‘ब्लैक फंगस’ को वे महामारी कानून के तहत अधिसूचित करें और एक-एक मामले की रिपोर्ट की जाए। केंद्र ने आम जनता के लिए कोविड संबंधी जो दिशा-निर्देश जारी किए हैं, उनमें कहा गया है कि कोविड संक्रमण हवा में दस मीटर तक फैल सकता है। इससे बचने के लिए डबल मास्क लगाना चाहिए और बंद जगहों पर ताजा हवा के इंतजाम किए जाने चाहिए। धीरे-धीरे वैज्ञानिक इस बात को मानने लगे हैं कि कोविड के फैलने को लेकर जो समझ पहले थी, उसमें सुधार की जरूरत है। शुरुआत में माना गया था कि कोरोना वायरस हवा में दूर तक नहीं फैलता और मरीज के छींकने या खांसने से जो छोटी-छोटी बूंदें गिरती हैं, उन्हीं से यह बीमारी फैलती है। यह भी माना जा रहा था कि ऐसी बूंदें किसी सतह पर पड़ी रहें, तो वे संक्रमण के फैलने का जरिया बन सकती हैं। इसीलिए शुरू में एक मीटर की दूरी बरतने का निर्देश जारी किया गया था और सतहों को न छूने और उनको कीटाणुरहित करने पर जोर था। यह कोई विचित्र बात नहीं है। हवा से किसी वायरस या बैक्टीरिया के नमूने एकत्र करना और उनके खतरों का मूल्यांकन बहुत मुश्किल होता है। टीबी और खसरा जैसी बीमारियों के साथ भी यही हुआ था। लंबे दौर तक यह माना गया था कि ये बीमारियां हवा से नहीं, सिर्फ बूंदों से फैलती हैं, बाद में यह आकलन गलत साबित हुआ। कोरोना वायरस के बारे में भी ऐसे असंदिग्ध तथ्य नहीं मिले हैं, जिनसे ठीक-ठीक बताया जा सके कि कोरोना हवा में कितनी दूर तक फैलता है और उसका खतरा कितनी देर तक रहता है, लेकिन अब यह लगभग आम सहमति है कि कोविड का संक्रमण मुख्यत: हवा से होता है, सतहों को छूने से होने वाले संक्रमण की मात्रा बहुत कम है, इसलिए बार-बार उनको साफ करने की कोई खास जरूरत नहीं है। एक और खास बात जो उभरकर आई है, वह है ताजा हवा की जरूरत। पाया गया है कि बंद कमरों में या ऐसी जगहों पर, जहां हवा के आने-जाने का इंतजाम नहीं है, कोरोना का वायरस देर तक रह सकता है। इसलिए जहां एयर कंडिशनिंग जरूरी भी है, वहां बार-बार ताजा हवा के आने का इंतजाम जरूरी है। कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि खुली जगहों पर कोविड संक्रमण के प्रसार की आशंका कई गुना कम हो जाती है। कुछ वैज्ञानिकों का जोर है कि जैसे 19वीं सदी में साफ पानी पर जोर दिया गया था और उससे कई बीमारियों पर नियंत्रण हो गया, वैसे ही अब यदि हवा की गुणवत्ता को मुद्दा बनाया जाए, तो बहुत सारी बीमारियों से मुक्ति मिल सकती है। कोविड ने बीमारियों के फैलने में हवा के महत्व को फिर रेखांकित किया है। दस मीटर यानी काफी बडे़ कमरे में कोरोना हवा के जरिए फैल सकता है। यह दस मीटर भी कोई पत्थर की लकीर नहीं है। इससे सिर्फ यही पता चलता है कि काफी दूर तक कोरोना का वायरस हवा में जा सकता है और इसी नजरिए से बचाव के उपाय करने होंगे। वैक्सीनेशन से बचाव को पाने में अभी वक्त लगेगा और वह भी शत-प्रतिशत नहीं होगा। इसलिए बचाव के असली उपाय वही सावधानियां हैं, जिनके पालन में लोग लापरवाही कर जाते हैं। मास्क का सही इस्तेमाल, शारीरिक दूरी का ख्याल और खुली हवा का इंतजाम जैसे तरीके अभी सबसे कारगर बचाव हैं। ब्लैक फंगस ने वैसे भी चुनौती बढ़ा दी है।


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