संकट से गुजरता देश

वजह महामारी हो या कुछ अन्य, जब समूचा देश एक व्यापक संकट से गुजर रहा है, तब सरकार का यह दायित्व हो जाता है कि वह जनता की मुश्किलों को कम करने के लिए तात्कालिक या फिर दीर्घकालिक कदम उठाए। लेकिन पिछले कुछ समय से ऐसा लगता है कि सरकार ने जनता को उस बाजार के भरोसे छोड़ दिया है, जिसका मुख्य मकसद किसी भी तरह मुनाफा कमाना होता है। सवाल है कि जिस समय लोगों की आय में कमी आ रही हो, बहुत सारे लोगों की रोजी-रोटी पर संकट आ गया हो, तब पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी की क्या तुक है! यह दलील दी जा सकती है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव पर निर्भर है। लेकिन अव्वल तो देश में संकट के वक्त सरकार चाहे तो तेल कंपनियों को कीमतों को नियंत्रित रखने की सलाह दे सकती है। फिर ऐसा क्यों है कि पिछले डेढ़-दो महीने में, जब कुछ राज्यों में चुनाव चल रहे थे, तब पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर बने हुए थे और अब अचानक ही इसमें लगातार बढ़ोतरी होने लगी है! गौरतलब है कि हाल के इजाफे के बाद देश के कुछ हिस्सों में पेट्रोल की कीमत प्रति लीटर सौ रुपए से ज्यादा और डीजल नब्बे रुपए के पार हो गई है। कुछ समय पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी होने के चलते दाम कुछ कम हुए थे, लेकिन उसे नाममात्र की कमी कहा जा सकता है। अब फिर जिस तरह कीमतों में इजाफा होना शुरू हो गया है, उससे यह आशंका पैदा हो रही है कि क्या इसका गंभीर प्रभाव दूसरे क्षेत्रों पर पड़ेगा! हो सकता है कि पेट्रोल के दाम का असर मुख्य रूप से निजी वाहन से सफर करने वालों पर पड़े, लेकिन यह किसी से छिपा नहीं है कि डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर आम लोगों की रोजमर्रा की गतिविधियों से लेकर खाने की थाली तक पड़ता है।

यह साधारण गणित है। इसके बावजूद न तो तेल कंपनियों को इस बात से फर्क पड़ता है कि वक्त की नजाकत के मद्देनजर वे पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखें, न सरकार को ऐसे संकट के समय में जनहित को देखते हुए तेल कंपनियों पर लगाम कसना जरूरी लगता है। पिछले साल भर से ज्यादा से कोरोना महामारी के चलते पूर्णबंदी या आंशिक बंदी जैसे हालात ने आम लोगों के सामने काफी मुश्किलें पैदा कर दी हैं। एक ओर जहां गरीब आबादी के सामने खुद को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है, वहीं मध्यवर्ग की क्रयशक्ति में भी तेज गिरावट आई है। व्यक्तिगत जमापूंजी के सहारे बाजार या अर्थव्यवस्था लंबे समय तक नहीं खिंच सकती। सरकार के सामने यह एक बड़ा काम है कि वह पूर्णबंदी और लोगों के रोजी-रोजगार के बीच कैसे संतुलन बिठाती है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि समूचे देश की अर्थव्यवस्था अच्छी या बुरी हालत के संदर्भ में पेट्रोल और डीजल की कीमतों के इर्द-गिर्द ही घूमती है। अगर देश के लोगों की क्रयशक्ति संतोषजनक रहेगी तो इससे बाजार का रुख बेहतरी की ओर रहेगा और अर्थव्यवस्था भी रफ्तार पकड़ेगी।


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