लज्जाजनक और त्रासद दशा

सारी दुनिया और देश को पता है कि हमारे देश में कोरोना किस तरह कहर बरपा रहा है। ऐसे में विहार में गंगा नदी में लाशों का मिलना जितना दुखद है उतना ही हैरत अंेज भी। सबको पता है कि कोरोना ग्रस्त व्यक्ति की यदि मृत्यु हो जाती है, तो उसके अंतिम संस्कार के तरीके है, जिससे यह महामारी ना फैले, लेकिन इस तरह शव को नदी में बहा देना लोगों की जान के लिए, नदी के जल के लिए कितना जोखिम है, यदि महामारी की दिल हिला देनी वाली विभीषिका देखने के बाद भी यह लोगों की समझ में नहीं आ रहा है, तो फिर हमारी रक्षा कौन कर सकता है। आज जिस तरह महामारी को लेकर हमारे देश में हाय-तोबा मची हुई है, उसके पीछे ऐसी ही नदानियां ज्यादा जिम्मेदार है। हमने, हमारी सरकारों ने, लापरवाही की, निश्चिंतता  की इन्तहा कर दी और पहली लहर की सारी सावधानी और उपलब्धि हमने मिट्टी में मिला दिया। इसके बाद भी हम गंभीर नहीं हो रहे हैं। अब इन बहती लाशों पर भी यह उत्तर प्रदेश की है या विहार की यह शुरू हो गया है। अरे भाई यह सलूक जिसके भी मृतदेह के साथ हुआ है, वह इस देश का नागरिक था, तो यह ज्‍ाानने की बात है नहीं है कि वह कौन का था जानना यह जरूरी है कि कैसे वह नदी में पहुंचा। क्या हमारी संवेदना इतना मर चुकी है कि हम कुछ भी कर सकते हैं। माना की इस काल में कोरोना के चलते अपनी जान गंवाने वालों का परंपरगत पुरातन तौर तरीके से दाह संस्कार नहीं हो पा रहा है फिर भी उसके लिए भी व्यवस्था बनी है जिस रह लोग शव छोड़ रहे हैं और दाह संस्कार पुलिस अधिकारी और अन्य अधिकारियों को करना पड़ रहा है। वह स्वस्थ समाज की पहच्‍ाान नहीं है। शर्मिन्दगी की बात यह है कि यदि सरकारी कर्मचारी और अधिकारी एहतियात बारात कर कोरोना के वजह से जान गवांने वाले व्यक्ति का अंतिम संस्कार कर सकते हैं, तो उनके परिजन क्यों नहीं है। अापदा परीक्षा की घड़ी होती है। इसमें ना हम अपनी इंसानियत खोएं और ना ही ऐसी कुछ करें जैसा गंगा नदी में बक्सर में पाया गया। इससे हालत और खराब होंगे और मानवता को लज्जित करने के साथ हमारे छवि भी खराब करेंगे।


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